6. उच्छेदवादी होने के आरोप - Page 495

466 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर सम्पूर्ण वाघ्मय

5. आत्मा और पुनर्जन्म के सिद्धान्तों की आलोचना

  1. तथागत ने देशना दी थी कि कोई आत्मा नहीं है। तथागत ने साथ ही यह भी

पुष्टि की थी कि पुनर्जन्म है।

  1. ऐसे लोगों की कमी नहीं थी, जिन्होंने ऐसा उपदेश देने पर तथागत की आलोचना

की थी, जिसे वे दो परस्पर विरोधी सिद्धान्त मानते थे।

  1. वे पूछते थे, यदि कोई आत्मा नहीं है, तो पुनर्जन्म कैसे हो सकता है?
  2. इसमें कोई अंतर्विरोध नहीं है। यद्यपि बिना आत्मा के पुनर्जन्म (पुनर्भव) हो

सकता है।

  1. एक आम का बीज है। बीज एक आम के वृक्ष को उत्पन्न करता है। आम का

वृक्ष आम पैदा करता है।

  1. यहाँ आम का पुनर्जन्म (पुनर्भव) है।

  2. किन्तु यहाँ कोई आत्मा नहीं है।

  3. इसी प्रकार बिना आत्मा के पुनर्जन्म (पुनर्भव) हो सकता है।

6. उच्छेदवादी होने के आरोप

  1. एक बार जब तथागत श्रावस्ती के जेतवनाराम में ठहरे हुए थे। उन्हें यह सूचित

किया गया था कि अरिट्ठ नामक एक भिक्षु ऐसे मतों को तथागत द्वारा शिक्षित

सिद्धान्त समझने लगा है, जो तथागत का मत नहीं है।

  1. एक सिद्धान्त, जिसके विषय में अरिट्ठ तथागत को मिथ्या-निरुपित कर रहा

था, वह यह कि क्या वे उच्छेदवादी हैं।

  1. तथागत ने अरिट्ठ को बुलवाया, अरिट्ठ आया। प्रश्न किये जाने पर उसका

मुंह बंद हो गया और बैठा रहा।

  1. तथागत ने तब उससे कहा, ‘‘कुछ श्रमण और ब्राह्मण, गलत तौर से, भ्रान्तिपूर्ण

तथा मिथ्या रूप से-मुझ पर तथ्यों की अवज्ञा और एक उच्छेदवादी होने और

विघटन की देशना करने का तथा विद्यमान प्राणियों के उच्छेदन का आरोप

लगाते हैं।’’

  1. ‘‘यही तो मैं नहीं हूँ और जिसकी मैं पुष्टि नहीं करता।’’

  2. ‘‘जो कुछ मैंने पहले भी और आज भी निरन्तर उपदेशित किया है, वह यह है

कि दुख का अस्तित्व है और दुख का निरोध भी है।’’