469
नमस्कार, संघ को नमस्कार कहा।
- जब उसने ऐसा कहा तो भारद्वाज क्रोधित हो गया और चिल्लाया, ‘‘यहाँ अब
हे अभागिन! तू हमेशा उस सिर-मुण्डे भिक्षु की प्रशंसा करती रहती है? हे
अभागिन! अब मैं तेरे उस गुरु को जाकर सबक सिखाऊँगा।’’
- धानन्जानी ने उत्तर दिया, ‘‘हे ब्राह्मण! मैं देवों, मारों या ब्रह्मों के सम्पूर्ण लोक
में किसी ऐसे, श्रमण या ब्राह्मण को, किसी मनुष्य या देवता को नहीं जानती,
जो इस प्रकार उन तथागत, अर्हन्त, सम्यर्क सम्बुद्ध की भर्त्सना कर सके। फिर
भी, तुम जाओ ब्राह्मण और तब तुम स्वयं जान जाओगे।’’
- तब खिझा हुआ और अप्रसन्न भारद्वाज तथागत को खोजने गया, वहां पहुंचकर
उनके समक्ष उन्हें अभिवादन किया। मित्रवत और शिष्टाचारपूर्वक कुशल-क्षेम
पूछा और एक ओर बैठ गया।
- इस प्रकार बैठे उसने तथागत से निम्नलिखित प्रश्न पूछे, ‘‘सुखपूर्वक रहने के
लिए हमें किसका वध करना चाहिये? अधिक रोना न पड़े, इसके लिये किसका
वध करना चाहिये? गौतम सभी वस्तुओं से ऊपर क्या है, जिसकी हत्या की
आप सहमति देते हैं?’’
- तथागत ने इस प्रकार उत्तर दिया, ‘‘सुखपूर्वक रहने के लिए तुम्हें क्रोध की ही
हत्या करनी चाहिये, और अधिक रोना न पड़े इसके लिए तुम्हें क्रोध का ही वध
करना चाहिये। हे ब्राह्मण! क्रोध की हत्या उसके विषैले मूल, व्यग्र पराकाष्ठा
और हिंसक माधुर्य सहित करनी चाहिये। यही हत्या आर्यों द्वारा प्रशंसित की
गयी है। अधिक न रोने के लिये शान्ति के लिये तुम्हें इसकी हत्या अवश्य कर
देनी चाहिये।’’
- तथागत द्वारा दिये गये उत्तर की श्रेष्ठता को समझकर भारद्वाज ब्राह्मण ने उनसे
कहाः ‘‘भगवान्! अद्भुत है, भगवान्! सर्वाधिक अद्भुत है! ठीक उसी प्रकार
जैसे गिरी हुए वस्तु को मनुष्य स्थापित कर दे या उसे प्रकट कर दे, जो प्रच्छन्न
रही हो, या उसको सही मार्ग निर्देशित कर दे, जो पथभ्रष्ट हो गया हो, या
अन्धकार में दीप जला दे, जिससे कि वे आँखों वाले ब्राह्य वस्तुओं को देख
सके, इसी प्रकार भगवन् गौतम ने विभिन्न प्रकार से मुझे अपना सद्धर्म दर्शा
दिया है। यहाँ तक कि मैं स्वयं बुद्ध, धम्म और संघ की शरण में जाता हूँ। मैं
गौतम के नियमों के अधीन गृह-त्याग करूँगा, मैं उनकी आज्ञा मानूँगा।’’
- अतः धानन्जानी बुद्ध की केवल एक अनुयायी ही नहीं थी, बल्कि उसने अपने
पति को भी बुद्ध का एक अनुयायी बना दिया था।