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- वह दल जो पहले ही उसकी सुन्दरता से प्रभावित हो गया था, उसकी बुद्धि से
और भी प्रभावित हुआ। उस दल ने उसे फूलों का एक गुलदस्ता प्रस्तुत किया,
जिसे उसने विवाह के एक प्रस्ताव के रूप में स्वीकार कर लिया।
- विशाखा ने घर लौटने के पश्चात् विवाह-दल ने उसका अनुसरण किया और
पुण्यवर्धन का विवाह प्रस्ताव धनन्जय के सम्मुख रखा। प्रस्ताव स्वीकृत हो गया
और पत्रों की अदला-बदली द्वारा सुनिश्चित हो गया।
- जब प्रसेनजित् ने इसके विषय में सुना, उसने साकेत चलने में पुण्यवर्धन का
साथ देने का प्रस्ताव किया, जो एक विशिष्ट सम्मान की बात थी। धनन्जय
ने राजा और उसके परिजनों, मिगार पुण्यवर्धन और उनके परिचरों का बड़ा ही
आदर-सत्कार किया, आतिथ्य की सभी बातों का व्यक्तिगत रूप से ध्यान रखा
गया।
- पाँच सौ सुनार दुल्हन के लिये गहने बनाने के लिये नियुक्त किये गये। धनन्जय
ने अपनी लड़की को, दहेज के रूप में, धन से भरी, पाँच सौ गाडि़याँ, सोने
के पात्रों से लदी हुई और पशुओं इत्यादि को दिया।
- जब विशाखा की विदाई का समय आया, धनन्जय ने उसको दस चेतावनियाँ दीं,
जिन्हें मिगार ने साथ के कमरे में होने के कारण सुन लिया। ये चेतावनियाँ थीं,
(1) घर की आग बाहर नहीं जाने देना, (2) बाहर की आग घर में नहीं आने
देना, (3) केवल उन्हीं को देना जो बदले में लौटायें, (4) उनको नहीं देना जो
बदले में नहीं लौटाये, (5) उसे देना जो देता है जो नहीं देता उसे नहीं देना,
(7) प्रसन्नतापूर्वक बैठना, (8) प्रसन्नतापूर्वक खाना-पीना, (9) आग की
देखभाल करना और (10) गृह-देवताओं का सम्मान करना।
- अगले दिन धनन्जय ने अपनी लड़की के लिये आठ गृहस्थों को उत्तरदायी
(प्रतिभू) के रूप में नियुक्त किया जो लड़की के गुण-दोषों का विवेचन करें।
उनका कर्तव्य था कि यदि विशाखा पर कोई आरोप लगाया जाए तो उसकी
जांच करें।
- मिगार चाहता था कि उसकी पुत्र-वधू श्रावस्ती की जनता द्वारा अवश्य देखी
जाये। विशाखा ने अपने रथ पर खड़े हुए श्रावस्ती में प्रवेश किया और जनता
सड़क के दोनों ओर पंक्तिबद्ध खड़ी थी। जनता ने उस पर उपहार बरसाये,
किन्तु इन्हें उसने लोगों के मध्य ही बाँट दिया।
- मिगार निगण्ठों का अनुयायी था और विशाखा के घर में आने के बाद शीघ्र
ही, उसने उन्हें बुलवाया और उसको उनकी सेवा करने के लिये कहा। किन्तु
विशाखा ने उनकी नग्नता के कारण इन्कार कर दिया, उनके प्रति सम्मान प्रदर्शित