472 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर सम्पूर्ण वाघ्मय
करना अस्वीकार कर दिया।
- निगण्ठों ने आग्रह किया कि उसे वापस भेज दिया जाये, किन्तु मिगार ने प्रतीक्षा
करना उचित समझा।
- एक दिन जब मिगार भोजन कर रहा था, जबकि विशाखा पास खड़ी उसका
पंखा झल रही थी, एक भिक्षु घर के बाहर खड़ा दिखाई दिया। विशाखा एक
ओर खड़ी हो गयी, जिससे मिगार उसको देख सके। किन्तु मिगार भिक्षु की
ओर ध्यान न देते हुए भोजन करता रहा।
- यह देखकर विशाखा ने भिक्षु से कहा, ‘‘आगे बढ़ जायें भन्ते! ससुरबासी भोजन
कर रहे हैं।’’ मिगार क्रोधित हो गया और उसे वापिस भेज देने की धमकी दी,
किन्तु उसके आग्रह पर मामला उसके उत्तरदायियों (प्रतिभू) को निर्दिष्ट कर
दिया गया।
- उन्होंने विशाखा विरुद्ध लगाये गये अनेक आरोपों की जाँच की और उसे निर्दोष
घोषित किया।
- विशाखा ने तब आदेश दिया कि उसके माता-पिता के पास उसके लौटने की
तैयारियां की जायें। मिगार और उसकी पत्नी दोनों ने ही उससे क्षमा करने का
निवेदन किया, जो उसने दे दी, लेकिन इस शर्त पर कि वे बुद्ध और उनके
भिक्षुओं को घर में आमन्त्रित करेंगे।
- यह उसने किया, किन्तु निगण्ठों के प्रभाव के कारण, उसने उनके अतिथि-सत्कार
का काम विशाखा को ही सौंप दिया, और भोजन की समाप्ति पर एक पर्दे के
पीछे से बुद्ध का उपदेश सुनने मात्र के लिए ही सहमत हुआ। 27. वह उपदेश द्वारा इतना प्रभावित हुआ कि वह एक उपासक बन गया। 28. विशाखा के प्रति अत्यन्त कृतज्ञ था। इसके बाद वह उसको अपनी माता के
समान समझने लगा और उसी प्रकार आदर-सत्कार करने लगा। इस समय के
बाद वह मिगार माता कहलाती थी।
- ऐसी थी विशाखा की दृढ़-श्रद्धा।
3. मल्लिका की निष्ठा
- एक बार जब तथागत श्रावस्ती के जेतवनाराम में ठहरे हुए थे, एक गृहस्थ का
प्रिय पुत्र मर गया था। इस शोक में पिता ने अपने व्यवसाय और अपने भोजन
को उपेक्षित ही कर दिया।