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- वह सदैव श्मशान-भूमि जाया करता था और वहाँ, यह कहते हुए उच्च स्वर
में विलाप किया करता था, ‘‘तुम कहाँ हो, मेरे पुत्र, तुम कहाँ हो?’’ 3. शोक-संतप्त पिता तथागत के पास आया और अभिवादन के पश्चात् एक ओर
बैठ गया।
- यह देखकर कि उसका चित्त पूर्णतया खाली था, किसी भी वस्तु में रुचि नहीं
दर्शा रहा था, अपने आने का उद्देश्य भी नहीं बता रहा था, उसकी अवस्था को
समझकर तथागत ने कहा, ‘‘तुम अपने आपे में नहीं हो, तुम्हारा चित्त पूर्णतया
अस्थिर है।’’
- ‘‘भगवान्! मेरा चित्त कैसे स्थिर रह सकता है, जब कि मैंने अपना प्रिय और
एकमात्र पुत्र खो दिया है?’’
- ‘‘हाँ गृहपति! हमारे प्रियजन ही शोक, संताप, कष्ट, दुःख, पीड़ा और विपत्ति
लाते हैं।’’
- ‘‘यह सुनकर उस गृहपति को क्रोध आ गया, और बोला, ‘‘भगवान्! ऐसे एक
दृष्टिकोण को कौन स्वीकर कर सकता है? बल्कि, हमारे प्रियजन हमारे लिये
आनंद और सुख का कारण होते हैं।’’
- और इन शब्दों के साथ गृहपति, तथागत के कथन को अस्वीकार करते हुए,
रुष्ट होकर उठ खड़ा हुआ और चला गया।
- समीप ही कुछ जुआरी पासा खेल रहे थे। गृहपति उनके पास आया और उन्हें
अपनी सब बात कह सुनाई कि कैसे उसने अपना दुःख श्रमण को सुनाया, कैसे
उसका स्वागत उन्होंने किया और कैसे वह रुष्ट होकर चला गया। 10. जुआरियों ने कहा, ‘‘तुम एकदम ठीक हो, क्योंकि हमारे प्रियजन हमारे लिये
आनंद और सुख के स्रोत होते हैं।’’ अतः गृहपति को लगा कि उसे जुआरियों
से अपनी बात का समर्थन प्राप्त है।
- धीरे-धीरे अब यह बात महल के अंतःपुर तक पहुँच गयी, जहाँ राजा ने रानी
मल्लिका को बताया कि तुम्हारे श्रमण गौतम ने कहा है कि प्रियजन शोक,
संताप, कष्ट, पीड़ा और विपत्ति लाते हैं।
- ‘‘ठीक है स्वामी! यदि तथागत ने ऐसा कहा है, तो ठीक ही कहा है।’’
- ‘‘मल्लिका! जैसे एक शिष्य जो उसका गुरु उसे कहता है, यह कहते हुए वह
सब स्वीकार कर लेता है।’’ ठीक उसी प्रकार तू भी जो कुछ श्रमण गौतम
कहते हैं, तुम भी यह कहते हुए, वह सब स्वीकार कर लेती हो। यदि तथागत
ने ऐसा कहा है, तो यह ऐसा ही है, तुम दूर हट जाओ।