476 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर सम्पूर्ण वाघ्मय
- रात बीतने पर राजकुमार ने अपने ‘पद्म’ नामक महल में श्रेष्ठ भोजन तैयार
करने का आदेश दिया और महल की सीढि़यों पर सफेद वस्त्र बिछवाने की
आज्ञा दे दी, उसके पश्चात् ब्राह्मण युवक को तथागत को यह सूचित करनेके
लिये भेजा कि भोजन तैयार है।
- यह हो जाने पर उस दिन पूर्वाह्न में, चीवर धारण कर और हाथ में भिक्षा-पात्र
लेकर तथागत महल में आये, जहाँ दरवाजे के बाहर राजकुमार उनका इन्तजार
कर रहा था।
- तथागत को आते देखकर राजकुमार आगे बढ़ा और उनका अभिवादन किया
तथा उनके भिक्षु-संघ के साथ-साथ महल की ओर बढ़ा।
- सीढि़यों के नीचे तथागत चुपचाप रुक गये। राजकुमार ने कहा, ‘‘मैं तथागत के
बिछे वस्त्रों पर चरण रखने का आग्रह करता हूँ, मैं तथागत से ऐसा करने का
आग्रह करता हूँ, जो कि चिरकाल तक हित और कल्याण के लिये होगा।’’
किन्तु तथागत शान्त खड़े रहे।
- दूसरी बार राजकुमार ने निवेदन किया और तब भी तथागत शान्त रहे। तीसरी
बार भी राजकुमार ने निवेदन किया, और तथागत ने आनन्द की ओर देखा। 9. आनन्द समझ गये कि समस्या क्या थी और उन्होंने कहा कि बिछा हुआ वस्त्र
लपेट दिया जाये और हटा दिया जाये क्योंकि तथागत उस पर पैर नहीं रखेंगे,
क्योंकि जो उनके बाद उनके पीछे आयेंगे अर्थात् आने वाली जनता का ख्याल
कर उस बिछे हुए कालीन पर पैर नहीं रखेंगे।
- अतः राजकुमार ने बिछे हुए कालीन को लपेटने और हटा देने का आदेश किया,
उसके पश्चात् उसने महल में ऊपर आसन लगाने का आदेश दिया। 11. तथागत तब भिक्षु-संघ सहित ऊपर गये और उनके लिये बिछे आसन पर बैठ
गये।
- राजकुमार ने स्वयं अपने हाथों से दिल खोलकर वह श्रेष्ठ भोजन तथागत और
भिक्षु-संघ को परोसा।
- तथागत के भोजन समाप्ति के पश्चात्, राजकुमार बोधि एक ओर एक नीचे
आसन पर बैठ गया, और तथागत से बोला, ‘‘भगवान्! मेरा मत यह है कि
क्या वास्तविक कल्याण सुखद वस्तुओं के द्वारा अथवा असुखद वस्तुओं के
द्वारा प्राप्त किया जाना चाहिए।’’
- तथागत ने उत्तर दिया, ‘‘राजकुमार!’’ बीते हुए दिनों में, मैं भी यही मत अपनी
बोधि-प्राप्ति से पहले के दिनों में रखता था। वह समय था, जब पर्याप्त युवा