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होने के कारण मेरे कोयले समान काले बाल थे और मेरी तारुण्यता की प्रारम्भ
की सम्पूर्ण सुन्दरता के साथ अपने माता-पिता की इच्छाओं के बावजूद उन्हें
दुःखी और शोकग्रस्त होते हुए छोड़कर मैंने केश और दाढ़ी मुँडवा ली, काषाय
वस्त्र धारण कर लिये और गृह से गृह-त्याग की अवस्था में एक प्रव्रजित के
रूप में चला गया। अब एक परिव्राजक के रूप में, कल्याण की तलाश में
और उस अनुपम शान्ति की ओर जानेवाले मार्ग की खोज में हूँ, जो अतुलनीय
है।’’
- ‘‘अब मैं एक भिन्न मत रखता हूँ। यदि एक व्यक्ति सद्धर्म को जानता है, वह
सभी दुःखों का अन्त पा सकता है।’’
- राजकुमार ने तथागत से पूछा, ‘‘सद्धर्म क्या है? सद्धर्म की क्या व्याख्या है।
यह समझने में कितना सरल है?’’
- तब ब्राह्मण युवक संकिक-पुत्त उठा, ‘‘राजकुमार! यद्यपि आपने इस प्रकार
विश्वास प्रकट किया है, किन्तु आपको मैं बुद्ध, धम्म और संघ की शरण जाता
हूँ जैसा कहना चाहिये था।’’
- राजकुमार ने उत्तर दिया, ‘‘ऐसा मत कहो, मेरे मित्र ऐसा मत कहो, क्योंकि,
मैंने अपनी माँ के होठों से सुना है, कैसे, जब एक बार तथागत कोसाबमी के
घोषिताराम में ठहरे हुए थे, तब वे गर्भवती अवस्था में ही तथागत के पास
आयीं, उनका अभिवादन किया और एक ओर एक आसन ग्रहण किया, और
कहा, ‘भले ही यह लड़का हो या लड़की, जिसे मैं अपने गर्भ में धारण किये
हुए हूँ, मेरा अजन्मा बच्चा बुद्ध, धम्म और संघ की शरण कर रहा है, और मैं
तथागत से इस बच्चे को अपने अनुयायी के रूप में स्वीकार करने का निवेदन
करती हूँ, जो अब से जीवनप्रर्यन्त आपका शरणागत उपासक रहे।’’
- ‘‘दूसरी बार जब तथागत यहाँ भग्ग-देश में सुंसुभार पर्वत पर भेसकला वन में
मृगदाय में ठहरे हुए थे, मेरी दाई मुझे तथागत के पास ले गयी थी, और उनके
समक्ष खड़े होकर कहा था, ‘यह राजकुमार बोधि है जो बुद्ध, धम्म और संघ
की शरण ग्रहण करता है।’’
- ‘‘अब मैं व्यक्तिगत रूप से, तीसरी बार भी आपकी शरण में जाता हूँ और
तथागत से निवेदन करता हूँ कि अपने एक उपासक के रूप में मुझे स्वीकार
करें, जिससे जीवनपर्यन्त आपका शरणागत बना रहूँ।’’