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3. माता और पुत्र तथा पत्नी और पति की अंतिम भेंट
अपनी मृत्यु से पहले महाप्रजापति और यशोधरा तथागत से मिलीं।
यह संभवतः तथागत के साथ उनकी अंतिम भेंट थी।
महाप्रजापति ने पहले उनकी पूजा की।
वह उनकी ऋणी थी क्योंकि तथागत ने उन्हें सद्धर्म का सुख प्रदान किया था,
उसके लिए उन्होंने तथागत का आधार बल किया क्योंकि उनका आध्यात्मिक
जन्म उनके द्वारा हुआ था क्योंकि धम्म ने उनके द्वारा उनके अन्तःकरण का
विकास था, क्योंकि उन्होंने उनके द्वारा ही धम्म रूप दुग्ध का पान किया था,
क्योंकि उन्होंने उनकी सहायता से ही संसार-सागर को तैर कर पार किया था,
यह कितनी यशस्वी बात है कि वे बुद्ध की माता के रूप में जानी जाती हैं। 5. और तब महाप्रजापति ने अपनी बात कही ‘‘मैं इस देह का त्याग कर मृत्यु को
प्राप्त करना चाहती हूँ। हे दुःख का अंत करने वाले, भगवान् मुझे अनुमति दें।’’ 6. तथागत को संबोधित करते हुए यशोधरा ने भी कहा कि वह अपने अठहत्तरवें
वर्ष में है। तथागत ने उत्तर दिया कि वे अपने 80वें वर्ष में है। 7. यशोधरा ने उनसे कहा कि आज की रात ही उसकी अंतिम रात है वे उसी
रात मृत्यु को प्राप्त करने वाली है। महाप्रजापति की अपेक्षा उनका स्वर अधिक
संयत था। उन्होंने भगवान् से न मृत्यु को प्राप्त करने की अनुमति मांगी और
न ही उन्हें अपनी शरण में लेने का आग्रह किया।
इसके विपरीत, उन्होंने कहा (मे सरण अट्ठनो) अर्थात् मैं अपनी शरण स्वयं हूँ।
वह अपने जीवन के सभी बंधनों को काट चुकी थीं।
वह अपनी कृतज्ञता प्रगट करने आयी थी, क्योंकि तथागत ही उनके पथ-प्रदर्शक
थे और उन्हें शक्ति प्रदान की थी।
4. पिता और पुत्र की अंतिम भेंट
- एक बार जब तथागत राजगृह के वेलुवन में ठहरे हुए थे, इसी समय राहुल
अम्बलठिका में ठहरे थे।
- अपराह्न के उपरान्त तथागत जब अपनी समाधि से उठे तो वे राहुल की ओर
गये, राहुल ने तथागत को कुछ दूर से आता देखकर उनके बैठने के लिये एक
आसन तैयार किया और उनके पैर धोने के लिये जल रख दिया।