486 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर सम्पूर्ण वाघ्मय
- उनके लिए बिछाए गये आसन पर बैठकर, तथागत ने अपने पांव धोए और
राहुल ने भी अभिवादन के पश्चात् एक ओर अपना आसन ग्रहण किया। 4. राहुल को संबोधित करते हुए तथागत ने कहा, ‘‘जिसे जान-बूझकर झूठ
बोलने में लज्जा नहीं, ऐसा कोई पाप-कर्म नहीं है, जिसे वह कर नहीं सकता।
इसलिए राहुल! यह सीखना चाहिए कि हम हँसी-मज़ाक में भी कभी झूठ नहीं
बोलेंगे।’’
- ‘‘इसी प्रकार से तुम कोई भी कार्य करने से पहले उसके बारे में सोचो कोई
भी शब्द बोलने से पहले उसके बारे में सोचो, कोई भी बात मन में पैदा हो
उसका चिंतन करो।’’
- ‘‘जब तुम कोई भी कार्य करना चाहो तो पहले उसके बारे चिन्तन अवश्य करो
कि क्या तुम्हारे तथा दूसरों के लिये या दोनों के लिये अहितकर तो नहीं होगा,
क्योंकि एक दुष्ट-कर्म दुःख उत्पादक होता है और उसका परिणाम दुःखदायी
होता है। यदि तुम्हारा चिन्तन यह बताये कि अपेक्षित कार्य की यही प्रवृत्ति है,
तो तुम्हें वह नहीं करना चाहिये।’’
- ‘‘किन्तु यदि तुम्हारा चिन्तन आश्वासन देता है कि उसमें कोई अहित नहीं,
बल्कि हित ही है, तब तुम उसे कर सकते हो।’’
- ‘‘मैत्री का अभ्यास करो, क्योंकि मैत्री-भावना को अभ्यास द्वेष का शमना
(समाप्त, अंत) हो जायेगा।’’
- ‘‘करुणा का अभ्यास करो, क्योंकि करुणा-भावना का अभ्यास करने से खीज
का शमन (समाप्त, अंत) हो जायेगा।’’
- ‘‘मुदिता का अभ्यास करो, क्योंकि मुदिता-भावना का अभ्यास करने से घृणा
का शमन (समाप्त, अंत) हो जायेगा।’’
- ‘‘उपेक्षा का अभ्यास करो, क्योंकि अपेक्षा-भावना का अभ्यास करने से विरोध
का शमन हो जायेगा।’’
- ‘‘शरीर के अशुभ रूप चिन्तन का अभ्यास करो_ ऐसा करने से काम-राग व
मनोविकारों का शमन (समाप्त,अंत) हो जायेगा।’’
- ‘‘वस्तुओं की ‘अनित्य-भावना’ के बोध का अभ्यास करो, क्योंकि ऐसा करने
से अहंकार का शमन (समाप्त, अंत) हो जायेगा।’’
- तथागत ने जब इस प्रकार कहा, तो राहुल का मन यह सुनकर प्रफुल्लित हो
गया। उसने तथागत के कहने पर प्रसन्न मन से अभिनंदन किया।