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12. राजकुमार का प्रधानमंत्री को उत्तर
- पवित्र परम्परा से समर्थित उचित ही प्रतीत होने वाले इन वचनों को सुनकर
मेघ-गर्जन की भाँति दहाड़कर राजकुमार ने उत्तर दियाः
- ‘‘प्रेमभाव प्रकट करने वाला यह अभिभाषण आपके योग्य ही है, लेकिन मैं
बताऊँगा कि मुझे समझने में आपने कहाँ गलती की है।’’
- ‘‘मैं सांसारिक विषयों का तिरस्कार नहीं करता, मैं जानता हूँ कि सम्पूर्ण
मानव-जगत इसी में लिप्त है। लेकिन यह जानते हुए कि संसार अनित्य है, मैं
इनमें कोई सुख नहीं देखता हूँ।’’
- ‘‘यदि स्त्रियों की सुन्दरता स्थायी रहे, तो भी इच्छाओं के सुखों में आनंद लेना
बुद्धिमान व्यक्ति के योग्य नहीं है।’’
- ‘‘और जो आप कहते हैं कि बड़े-बड़े महान् व्यक्ति भी विषयों के वशीभूत
हुए हैं, तो वे इस विषय में प्रमाण नहीं हैं, क्योंकि वे भी क्षय को प्राप्त हुए
हैं।’’
- ‘‘जहाँ क्षय है, जहाँ सांसारिक वस्तुओं में आसक्ति है और जहाँ असंयम है,
वहाँ वास्तविक महानता नहीं हो सकती।’’
- ‘‘और जो यह आपका कहना है कि ‘ऊपरी मन से भी स्त्रियों से प्यार करना
चाहिए, यह शिष्टाचार के द्वारा किया गया हो, तो भी मुझे यह रुचिकर नहीं
है।’’
- ‘‘यदि उसमें सत्यता नहीं है, तो स्त्रियों की इच्छाओं के अनुसार अनुपालन भी
मुझे अच्छा नहीं लगता। जहां संपूर्ण रूप से व्यक्ति का मन और स्वभाव उसके
अनुकूल नहीं है, तो ऐसे अनुपालन का भी क्या अर्थ है?’’
- ‘‘जहाँ मन राग से वशीभूत है, जहाँ असत्यता में विश्वास किया जाता है, जहाँ
वस्तुओं के दोष में आसक्ति और भ्रम का सहारा लिया जाता है, वहाँ किसी
योग्यता की बात कहाँ है?’’
- ‘‘और, यदि राग से वशीभूत प्राणी एक दूसरे को धोखा देते हैं, तो क्या पुरुष
स्त्रियों के लिए अयोग्य और स्त्रियाँ पुरुषों के लिए अयोग्य नहीं हैं?’’
- ‘‘अगर वे चीजें ऐसी ही हैं, तब मुझे उम्मीद है, आप मुझे विषयभोग के अशोभन
कुपथ पर नहीं ले जाएँगे।’’