24 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर सम्पूर्ण वाघ्मय
- राजकुमार के सुनिश्चित दृढ़ संकल्प से उदायी निरुत्तर हो गया और उसने इसकी
सूचना राजा को दी।
- जब शुद्धोदन ने सुना कि उसके पुत्र का चित्त सभी प्रकार के विषयों से विमुख
हो गया है, तो उसे रातभर नींद नहीं आई। उसके दिल में वैसा ही दर्द था,
मानो किसी हाथी की छाती में तीर लगा हो।
- उन्होंने अपने मंत्रियों के साथ एक लम्बी मंत्रणा की ताकि सिद्धार्थ को सांसारिक
सुख-सुविधाओं की ओर अभिमुख करने के उपाय खोजे जाएँ और उसे जीवन
के संभावित झुकाव से दूर किया जाए। परंतु पहले जो उपाय किए जा चुके
थे, उनके अलावा उन्हें कोई दूसरा उपाय नहीं सूझा।
- जिनकी पुष्प की मालाएँ और अलंकार व्यर्थ सिद्ध हो चुके थे, जिनके हाव-भाव
और आकर्षण का कोई फल नहीं निकला था, उन सभी स्त्रियों को विदा कर
दिया गया।
13. शाक्य संघ में दीक्षा
- शाक्यों का अपना संघ था। बीस वर्ष की आयु के ऊपर सभी शाक्यों को संघ
में दीक्षित होना पड़ता था और उसका सदस्य बनना पड़ता था। 2. सिद्धार्थ गौतम बीस वर्ष का हो चुका था। यह उसके संघ में प्रवेश करने तथा
उसके सदस्य बनने का समय था।
- शाक्यों का एक सभा भवन था, जिसे संथागार कहा जाता था। यह कपिलवस्तु
में स्थित था। संघ की सभा संथागार में भी होती थी।
- सिद्धार्थ को संघ में दीक्षित कराने के लिए शुद्धोदन ने शाक्यों के पुरोहित को
संघ की सभा बुलाने को कहा।
- तदनुसार कपिलवस्तु में शाक्यों के संथागार में संघ एकत्रित हुआ।
- संघ की सभा में पुरोहित ने प्रस्ताव रखा कि सिद्धार्थ को संघ का सदस्य बनाया
जाए।
- शाक्यों का सेनापति तब अपने स्थान पर खड़ा हुआ और उसने संघ को इस प्रकार
संबोधित किया-‘‘शाक्य कुल के शुद्धोदन-परिवार में जन्मा सिद्धार्थ गौतम संघ
का सदस्य बनना चाहता है। यह बीस वर्ष का है और हर तरह से शाक्य-संघ
का सदस्य बनने के योग्य है। अतः मेरा प्रस्ताव है कि इसे शाक्य-संघ का
सदस्य बनाया जाए। जो कोई इस प्रस्ताव के विरुद्ध हों, बोले।’’