492 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर सम्पूर्ण वाघ्मय
- अगले दिन चुन्द ने अपने निवास-स्थान पर खीर आदि स्वादिष्ट भोजन तथा
कुछ ‘सूकर-मद्दव’ भी तैयार करवाया और भोजन का समय होने पर उसने
तथागत को सूचना भिजवाई कि ‘‘भगवान् भोजन का समय हो गया है और
भोजन तैयार है।’’
- तथागत ने स्वयं चीवर धारण किया और अपना भिक्षा-पात्र लेकर भिक्षुओं के साथ
चुन्द के निवास-स्थान पर गये और उसके द्वारा तैयार भोजन ग्रहण किया। 11. पुनः भोजन के उपरान्त तथागत ने चुन्द को धम्म पर प्रवचन दिया, तब अपने
आसन से उठे और वहाँ से विदा हुए।
- चुन्द द्वारा दिया गया भोजन तथागत के अनुकूल नहीं पड़ा, उन्हें गम्भीर रोग से
जकड़ लिया और रक्त-स्राव के साथ तेज व मर्मान्तक वेदना उन्हें मृत्युपर्यन्त
होती रही।
- किन्तु तथागत ने स्मृति-सम्प्रजन्य के साथ उसे बिना किसी शिकायत के सहन
किया।
- आम्रवन से लौटने पर और थोड़ा कुछ स्वास्थ्य सुधरने पर तथागत ने आनंद को
कहा, ‘‘आओ आनन्द! हम कुसीनारा को चलें’’ और भिक्षु-संघ सहित भगवान्
बुद्ध पावा से आगे कुसीनारा बढ़ गए।
3. कुसीनारा में आगमन
- तथागत कुछ थोड़ी दूर तक ही चले थे कि शीघ्र ही उन्होंने विश्राम की
आवश्यकता अनुभव की।
- रास्ते में ही तथागत सड़क से एक ओर हटकर एक वृक्ष के छाया में चले गये
और आनन्द से कहा, ‘‘ आनंद! संघाटी की तह लगा कर और मेरे लिए बिछा
दो। मैं थका हुआ हूँ आनन्द! कुछ देर विश्राम करूंगा।’’
- ‘‘बहुत अच्छा!’’ तथागत की बात की सहमति से भदन्त आनन्द ने चीवर चौहरा
तह किया और बिछा दिया।
- तथागत ने अपने लिये तैयार आसन पर अपना स्थान ग्रहण किया।
- जब वे बैठ गये, तथागत ने भदन्त आनन्द को संबोधित किया और कहा ‘‘आनन्द!
मेरे लिय थोड़ा जल ले आओ। मैं प्यासा हूँ, पानी पीऊंगा। जल पिऊंगा।’’ 6. आनन्द ने उत्तर दिया, ‘‘यह ककुत्थ नदी अधिक दूर नहीं, समीप है, इसका
जल स्वच्छ और सुखद है, ठण्डा और पारदर्शी है जल लेने में आसानी है तथा