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- ‘‘इस प्रकार मैंने वयोवृद्ध परिव्राजकों, गुरुओं और शिष्यों को यह कहते हुए
सुना है, संसार में विरले ही तथागत उत्पन्न होते हैं, जो अर्हत, सम्यक् संबुद्ध
हैं, और यहाँ आज रात, अंतिम प्रहर में श्रमण गौतम का महापरिनिर्वाण होगा।
आज मेरे मत में एक सन्देह उत्पन्न हुआ है और मुझे श्रमण गौतम पर विश्वास
है। श्रमण गौतम मुझे ऐसा उपदेश दे सकते हैं, जिससे कि मैं अपनी संदेहात्मक
अवस्था को दूर कर सकूँ।’’
- तब सुभद्र परिव्राजक मल्लों के सालवन की ओर जाने वाली छोटी सड़क की
ओर गये, जहां भदंत आनन्द थे और वहां पहुंचने पर उसने भदन्त आनन्द को
बताया, जो उन्होंने सोचा था और वह बोले ‘‘हे आनन्द स्थविर! कि मैं श्रमण
गौतम का दर्शन कर पाता।’’
- इन वचनों को सुनकर भदन्त आनन्द ने सुभद्र परिव्राजक से कहा ‘‘बहुत हो
गया, मित्र सुभद्र! तथागत को कष्ट मत दो। तथागत थके हुए हैं।’’
- तब दूसरी बार और यहां तक कि तीसरी बार भी सुभद्र परिव्राजक ने वही
निवेदन किया और वही उत्तर पाया।
- भदन्त आनन्द और सुभद्र परिव्राजक के मध्य की इस वार्ता को तब संयोग से
तथागत ने सुन लिया। और उन्होंने यह कहते हुए भदन्त आनन्द को पुकारा,
‘‘बहुत हो गया, आनन्द! सुभद्र को मत रोको। सुभद्र को तथागत के दर्शन
करने की अनुमति दो। जो कुछ भी सुभद्र मुझसे पूछेंगे वे यह सब जानने की
इच्छा से पूछेंगे, न कि मुझे कष्ट देने की इच्छा से। और जो कुछ भी मैं उत्तर
में कहूंगा, वह शीघ्रता से समझ लिया जायेगा।’’
- अतः अब भदन्त आनन्द ने सुभद्र परिव्राजक से कहा, ‘‘आप भीतर जायें, मित्र
सुभद्र! तथागत आपको अनुमति देते हैं।’’
- तब सुभद्र परिव्राजक भीतर तथागत के पास गये और उनके पास पहुंच कर
उन्होंने तथागत का अभिवादन किया और परस्पर कुशल-क्षेम पूछने के उपरान्त
सुभद्र एक ओर बैठ गये। इस प्रकार बैठे हुए सुभद्र परिव्राजक ने इस प्रकार
तथागत को संबोधित कियाः-
- ‘‘श्रमण गौतम! वे सभी श्रमण और ब्राह्मण जिनके पास जमात व अनुयायी हैं,
जो गणाचार्य हैं, सुप्रसिद्ध हैं, जो मतों के सुविख्यात संस्थापक हैं, बहुत लोगों
द्वारा धर्मात्मा की तरह पूजे जाते हैं, जैसे कि पूरण काश्यप, मक्खली गोशाल,
अजित केशकम्बली, पकुध कच्चायन संजय, बेलट्ठिपुत्त तथा निगण्ठनातपुत्त
इन सभी ने जैसा वे कहते हैं, स्वयं अपने ज्ञान द्वारा वस्तुओं के सत्य को जान