498 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर सम्पूर्ण वाघ्मय
लिया है, या उन सभी में से किसी ने भी इसे नहीं जाना या स्वयं अपने ज्ञान
द्वारा कुछ ने जान लिया है और दूसरों ने इसे नहीं जाना?’’ 10. ‘‘इसे जाने दो, सुभद्र! अपने को ऐसी बातों के लिये कष्ट मत दो कि किसी ने
भी ज्ञान प्राप्त नहीं किया या कुछ ने जान लिया है या नहीं। मैं तुम्हें धर्म का
उपदेश देता हूँ, सूभद्र! तुम ध्यान से सुनो अपना चित्त लगाओ मैं कहता हूँ।’’ 11. ‘‘बहुत अच्छा भगवान्!’’ सुभद्र परिव्राजक ने कहा और तथागत की ओर ध्यान
दिया। तब तथागत ने यह कहाः
- ‘‘सुभद्र! जिस किसी भी धर्म-विनय (मत) में आष्टांगिक मार्ग नहीं पाया
जाता है, उसमें कोई श्रमण भी नहीं पाया जाता है। और सुभद्र! जिस किसी ध
र्म-विनय में आर्य आष्टांगिक मार्ग पाया जाता है, उसमें श्रमण भी पाया जाता
है।’’
- ‘‘सुभद्र! इस (मेरे) धर्म-विनय में आर्य आष्टांगिक मार्ग है। इसलिये इसमें भी
इन चार श्रेणियों के (स्रोतापन्न, सकद्ागामी, अनागामी और अर्हत) श्रमण पाये
जाते हैं। दूसरे मत श्रमणों से शून्य हैं। किन्तु यदि हे सुभद्र इस धर्म-विनय में
भिक्षु सम्यक् जीवन व्यतीत करते रहेंगे, तो संसार अर्हतों से शून्य नहीं होगा। 14. ‘‘जब मेरी आयु उन्नतीस वर्ष की थी, तब मैं कल्याण-पथ की खोज में निकला
था।’’
- ‘‘सुभद्र! अब पचास वर्ष से अधिक व्यतीत हो चुके हैं। जब से मैंने सद्धर्म का
पक्ष ग्रहण किए हुए हूँ और इसके लिए मैंने संसार का त्याग किया था।’’ 16. तथागत के इस प्रकार कहने पर सुभद्र परिवाजक ने तथागत से कहा ‘‘आपके
मुख से निकले ये वचन अदभुत हैं! श्रमण गौतम अद्भुत हैं।’’ ‘‘जैसे कोई
मनुष्य फैंके हुए को उसे स्थापित कर दे, जिसे मिटा दिया गया हो, या उसे
प्रकट कर दे, जो ढके को उघाड़ दे, या पथभ्रष्ट को मार्ग दिखा दे, या अन्ध
कार में दीप जला दे, जिससे कि आंख वाले देख सकें।’’
- ‘‘ठीक इसी प्रकार मुझे तथागत द्वारा सत्य का ज्ञान करा दिया गया है। और
यहाँ तक कि मैं स्वयं बुद्ध, धम्म और संघ की शरण में जाता हूँ।’’ 19. ‘‘सुभद्र! जो पहले किसी दूसरे मत का अनुयायी रहा था संघ में प्रविष्ट हो
उसे चार महीने के समय के लिये प्रतिक्षा करनी पड़ती ऐसा नियम था।’’ 20. ‘‘यदि यह ही नियम है तो मैं भी प्रतिक्षा करने के लिए तैयार हूं।’’ सुभद्र ने
कहा।