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- किन्तु तथागत ने कहा, ‘‘मैं मनुष्यों में अन्तर को स्वीकार करता हूँं’’। इस प्रकार
कहते हुए उन्होंने भदन्त आनन्द को बुलाया और आनन्द से कहा, ‘‘आनन्द!
सुभद्र को संघ में प्रवेश दे दो।’’
- ‘‘बहुत अच्छा, भगवान्!’’ भदन्त आनन्द ने तथागत की आज्ञा स्वीकार की।
- और सुभद्र परिव्राजक ने भदन्त आनन्द से कहा, ‘‘मित्र आनन्द! आपका लाभ
महान है, मित्र आनन्द! आपका गौरव महान है कि आप सभी को तथागत
ने स्वयं अपने हाथ से इस भिक्षु-संघ में दीक्षित किया है। धर्म के जल से
अभिसिंचित किया है।’’
- ‘‘सुभद्र! तुम्हारे विषय में भी तो यही सत्य हैं’’ आनन्द ने उत्तर दिया। इस
प्रकार तथागत की अनुज्ञा से सुभद्र परिव्राजक को भिक्षु-संघ में प्रविष्ट कर
लिया गया। वह अन्तिम शिष्य था जिसे तथागत ने स्वयं अपने हाथों से दीक्षित
किया था।
3 अंतिम वचन
तब तथागत ने भदन्त आनन्द से कहाः
‘‘आनन्द! यह हो सकता है कि तुम यह कहो कि हमारे शास्ता चले गये हैं,
अब हमारे पास कोई शास्ता नहीं है!’’ ‘‘किन्तु आनन्द! तुम्हें ऐसा नहीं सोचना
चाहिये, क्योंकि जब मैं नहीं रहूँगा तब मेरे द्वारा प्रशिक्षित और अनुभूतित धम्म
और विनय ही तुम्हारा शास्ता होगा।’
- ‘‘अब, आनन्द! क्योंकि भिक्षु एक दूसरे को समान रूप से सम्बोधित करते
हैं, जब मैं नहीं रहूँगा, तब यह प्रचलन बन्द हो जाना चाहिये। आनन्द! अब
बड़े-छोटे का कोई भेद नहीं है। भविष्य में बड़े द्वारा जो श्रामणेर है, उसका
नाम लेकर या आवुसो (आयुष्मान) कहकर पुकार सकता है किन्तु। आनंद!
एक श्रामणेर द्वारा एक अग्रज भिक्षु को उसके गोत्र से अथवा ‘भन्ते’ सम्बोधित
करना चाहिये।’’
- ‘‘और आनन्द! जब मैं नहीं रहूँ, तो संघ चाहे, छोटे-मोटे नियमों को समाप्त
कर सकता है।’’
- ‘‘आनन्द! तुम जानते हो कि भिक्षु छन्न कितना जिद्दी, उल्टे मार्ग पर चलने
वाला और विनय की भावना से रहित है।’’
- ‘‘आनन्द! जब मैं नहीं रहूँ तो छन्न को ‘ब्रह्म-दण्ड’ दिया जाये।