500 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर सम्पूर्ण वाघ्मय
- आनन्द ने पूछा, ‘‘भगवान्! ‘ब्र“म दण्ड’ से आपका क्या अभिप्राय है?’’
- ‘‘आनन्द! भिक्षु छन्न जो कुछ भी कहे उसे कहने दिया जाए उसके साथ बात न
की जाए, उसे समझाया न जाये, भिक्षुओं द्वारा उसे निर्देशित न किया जाये। उसे
अकेला छोड़ दिया जाना चाहिये। इससे सम्भवतः उसमें कुछ सुधर हो जाए।’’ 9. तब तथागत ने भिक्षुओं को सम्बोधित कियाः
- ‘‘भिक्षुओ! यह हो सकता है कि किसी भिक्षु के मन में या तो बुद्ध के विषय
में या धम्म के विषय में, या संघ के विषय में, या मार्ग, या मार्ग के रास्ते के
विषय में सन्देह या विचिकित्सा हो। यदि ऐसा है, तो भिक्षुओ! तुम लोग अभी
पूछ सकते हो। इसके पश्चात् यह सोचकर पश्चाताप न करना, जब हमारे शास्ता
हमारे सम्मुख थे, फिर भी हममें तथागत से प्रश्न पूछने का साहस न था।’’ 11. ऐसा कहने पर भिक्षु शान्त रहे।
- तब दूसरी बार और यहाँ तक कि तीसरी बार भी तथागत ने उन्हीं वचनों से
भिक्षुओं को सम्बोधित किया। और तीसरी बार भी भिक्षु शान्त रहे। 13. तब तथागत ने कहा, भिक्षुओ! हो सकता है कि शास्ता के प्रति श्रद्धा होने के
कारण तुम लोग पूछ नहीं रहे हो। तब भिक्षुओ! मुझसे ऐसे बात करो जैसे एक
मित्र दूसरे मित्र से करता है।’’
इस पर भी वे भिक्षु शान्त रहे।
तब भदन्त आनन्द ने तथागत को कहा, ‘‘भगवान्! यह अद्भुत है, भगवान्! यह
एक आश्चर्य है, भगवान्! इस प्रकार मुझे भिक्षुओं के इस संघ पर विश्वास है। कोई
भी ऐसा भिक्षु नहीं है, जिसे बुद्ध, धम्म या संघ के विषय में, या आर्य-मार्ग के
विषय में, या आर्य-मार्ग के रास्ते के विषय में कोई सन्देह या विचिकित्सा हो।’’ 16. ‘‘आनन्द! तुम विश्वास से ऐसा कह रहे हो, किन्तु तथागत को इस तथ्य का
ज्ञान है कि किसी भी भिक्षु को इस विषय में कोई सन्देह या विचिकित्सा नहीं
है। आनन्द! मेरे इन पाँच सौ भिक्षुओं में से यहाँ तक कि जो सबसे पिछड़ा है
वह भी एक स्रोतापन्न है, अर्थात् जो स्रोत में आ पड़ा है वह बोधि तक पहुँचने
के लिये सुनिश्चित है।’’
तब तथागत ने भिक्षुओं से कहाः
‘‘आओ भिक्षुओ! मैं तुम्हें यह पुनः स्मरण कराता हूँ, सभी संस्कार अनित्य हैं।
अप्रमादपूर्वक अपने लक्ष्य की प्राप्ति में लगे रहो।’’
- वे ही तथागत के अन्तिम वचन थे।