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4. आनन्द का शोक
- ज्यों-ज्यों आयु बढ़ने लगी तथागत को अपनी देखभाल करने के लिये एक निजी
सहायक की आवश्यकता पड़ी।
- उन्होंने पहले नन्द को चुना। नन्द के उपरान्त उन्होंने आनन्द को चुना, जिन्होंने
उनकी मृत्युपर्यन्त निजी सहायक के रूप में सेवा की।
- आनन्द सहायक मात्र ही नहीं थे, बल्कि उनके सतत और प्रियतम साथी भी
थे।
- जब तथागत कुसीनारा आये और साल वृक्षों के मध्य विश्राम कर रहे थे, उन्हें
लगा कि उनका अन्त समीप आ रहा है, और अनुभव किया कि यही समय है
कि उन्हें आनन्द को कह देना चाहिये।
- अतः उन्होंने आनन्द को बुलाया और कहा, ‘‘हे आनन्द! अब इसी रात्रि के
तीसरे पहर में, कुसीनारा के उपवन में, जुड़वा साल वृक्षों के मध्य, तथागत का
महापरिनिर्वाण होगा।’’
- जब उन्होंने इस प्रकार कहा तो भदन्त आनन्द ने तथागत को सम्बोधित किया,
और कहा, ‘‘हे तथागत! बहुत जनों के हित के लिये, बहुत जनों के सुख के
लिये, लोगों पर अनुकम्पा करने के लिये, देवताओं और मनुष्यों के हित, सुख
और लाभ के लिए कल्प भर (जीवित) रहने की कृपा करें।’’ 7. आनन्द ने तीन बार अपना निवेदन किया। तथागत का उत्तर था, ‘‘अब बहुत
हो गया, आनन्द! तथागत से अनुनय मत करो! ऐसी प्रार्थना करने का समय
व्यतीत हो चुका है।’’
- आनन्द! मैं अब वृद्ध हो चुका हूँ, वय-प्राप्त कर चुका हूँ, मेरी जीवन-यात्रा
समाप्ति के समीप है। मेरे दिन पूरे होने को आये हैं। मैं अस्सी वर्ष का हो गया
हूँ, जिस प्रकार एक पुरानी गाड़ी एक न एक दिन जीर्ण-शीर्ण हो जाती है, मैं
सोचता हूँ, वैसा ही तथागत के शरीर के साथ हो गया है। यह सुनकर, आनन्द
वहां से चले गये।
- आनन्द को न देखकर तथागत ने भिक्षुओं को बुलाया और कहा, ‘‘आनन्द कहाँ
है?’’ ‘‘भगवान्! आनन्द चले गये हैं और रो रहे हैं,’’ भिक्षुओं ने कहा। 10. तथागत ने एक भिक्षु को बुलाया और कहा, ‘‘जाओ भिक्षु! और आनन्द को
मेरी ओर से कहना, भदन्त आनन्द! शास्ता तुम्हें बुला रहे हैं।’’