13. शाक्य-संघ में दीक्षा - Page 54

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  1. इस प्रस्ताव के विरुद्ध कोई नहीं बोला। ‘‘दूसरी बार भी मैं पूछता हूँ, जो कोई

इस प्रस्ताव के विरुद्ध हों, बोलें।’’ सेनापति ने कहा।

  1. प्रस्ताव के विरुद्ध बोलने के लिए कोई खड़ा नहीं हुआ। सेनापति ने फिर कहा-‘‘मैं

तीसरी बार पूछता हूँ, जो कोई भी इस प्रस्ताव के विरुद्ध हों, बोले।’’ 10. तीसरी बार भी कोई भी प्रस्ताव के विरुद्ध नहीं बोला।

  1. शाक्यों के संघ की कार्यप्रणाली का यह नियम था कि बिना प्रस्ताव के कार्यवाही

नहीं की जा सकती थी और जब तक प्रस्ताव तीन बार पारित नहीं हो जाता

था, उसे मान्यता नहीं मिलती थी।

  1. सेनापति का प्रस्ताव तीन बार निर्विरोध पास हो गया तब सिद्धार्थ को शाक्य-संघ

के सदस्य के रूप में स्वीकार करने की घोषणा की गई।

  1. तब शाक्यों का पुरोहित खड़ा हुआ और उसने सिद्धार्थ को अपने स्थान पर खड़ा

होने को कहा।

  1. सिद्धार्थ को सम्बोधित करके उसने कहा-‘‘क्या आप अनुभव करते हैं कि

संघ ने सदस्य बनाकर आपको सम्मानित किया है?’’ ‘‘मैं अनुभव करता हूँ,

मान्यवर’’-सिद्धार्थ ने उत्तर दिया।

  1. ‘‘क्या आप संघ के सदस्यों के कर्त्तव्य जानते हैं?’’ ‘‘मुझे खेद है, मान्यवर,

मुझे पता नहीं हैं, किन्तु उन्हें जानकर मुझे प्रसन्नता होगी।’’ सिद्धार्थ ने उत्तर

दिया।

  1. ‘‘सबसे पहले मैं आपको संघ के सदस्य के कर्त्तव्य बताऊँगा’’-पुरोहित ने कहा

और एक-एक करके उसने बतायाः-

  1. तन, मन और धन से आपको शाक्यों के हितों की रक्षा करनी चाहिए।
  2. आपको संघ की सभाओं से अनुपस्थित नहीं रहना चाहिए।
  3. बिना भय और पक्षपात के आपको किसी शाक्य के आचरण में पाए गए दोष

को बताना चाहिए।

  1. यदि आप पर कोई दोषारोपण होता है, तो आपको क्रोधित नहीं होना चाहिए

और निर्दोष होने के लिए सफाई देनी चाहिए।’’

  1. पुरोहित ने तब आगे कहा-‘‘मैं इसके बाद आपको बताऊँगा कि क्या करने

से आप संघ की सदस्यता खो देंगेः