4. आनन्द का शोक - Page 531

502 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर सम्पूर्ण वाघ्मय

  1. ‘‘बहुत अच्छा, भगवन्!’’ भिक्षु ने कहा।

  2. जब आनन्द वापस आये, तो उन्होंने तथागत के एक ओर अपना आसन ग्रहण

किया।

  1. तब तथागत ने आनन्द से कहा, ‘‘रोओ मत, आनन्द! क्या मैंने पहले ही तुम्हें

बताया नहीं कि हमारे सबसे समीप और प्रिय वस्तुओं की यही प्रकृति है कि

हमें स्वयं को उनसे विमुक्त कर लेना चाहिये, उनका त्याग करना चाहिये और

उनसे अपना सम्बन्ध विच्छेद कर लेना चाहिये?’’

  1. ‘‘आनन्द! एक लम्बे समय तक तुम अपने मैत्रीपूर्ण, दयालु और हितकारी कार्यों

के कारण मेरे अत्यन्त समीप रहे हो।’’

  1. ‘‘आनन्द! तुम बहुत कुशल रहे हो। अपने प्रयासों में गम्भीर रहो आनन्द! अप्रमादी

रहो तुम भी विषयासक्ति अहं, मोह, भ्रान्ति और अज्ञान जैसे विकारों से मुक्त

हो जाओगे।’’

  1. तब आनन्द के विषय में भिक्षुओं को सम्बोधित करते हुए तथागत ने कहा,

‘‘भिक्षुओ! आनन्द एक बुद्धिमान व्यक्ति है।’’

  1. ‘‘वह जानता है कि तथागत के पास आने और भेंट करने का उचित समय

कौन-सा है? और संघ के भिक्षुओं और भिक्षुणियों के लिये, उपासक और

उपासिकाओं के लिये, एक राजा के लिये, या एक राजा के मंत्रियों के लिये,

अन्य आचार्यों और शिष्यों के लिये, तथागत से भेंट करने का उचित समय

कौन-सा है?’’

  1. ‘‘भिक्षुओ! आनन्द की ये चार विशेषतायें हैं।’’

  2. ‘‘सभी आनन्द से मिलकर प्रसन्न होते हैं। उनको देख कर सभी आनन्दित होते

हैं, उनको सुन कर वे प्रसन्न होते हैं। जब आनन्द मौन होते हैं, तब उन सभी

को कष्ट होता है।’’

  1. इसके उपरान्त आनन्द तथागत के महापरिनिर्वाण के विषय पर पुनः लौट आये।

तथागत को सम्बोधित करते हुए, उन्होंने कहा, ‘‘तथागत! जंगल के मध्य इस

उजाड़ नगरी में कृपा करके महापरि निर्वाण प्राप्त न करें। चम्पा, राजागृह,

श्रावस्ती, साकेत, कोसाम्बी और वाराणसी तथागत के लिए महान नगर है। कृपा

करके उनमें से किसी एक में महापरिनिर्वाण प्राप्त करें।’’

  1. ‘‘आनन्द! ऐसा मत कहो, आनन्द! ऐसा मत कहो। आनन्द! यह कुसिनारा किसी

समय केशवती के नाम के राजा महा-सुदर्शन की राजधानी थी।’’