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तत्पश्चात् तथागत ने आनन्द को दो काम सौंपे।
उन्होंने आनन्द को यह देखने को कहा कि यह विश्वास न फैलने देना कि
तथागत का महापरिनिर्वाण चुन्द द्वारा उन्हें दिये गये भोजन के परिणामस्वरूप हुआ
है। उन्होंने भय व्यक्त किया कि इससे सम्भवतः चुन्द संकट में न पड़ जाए।
उन्होंने आनन्द से इस विषय पर जनता को मन का भ्रम दूर करने को कहा। 24. दूसरी बात जो उन्होंने आनन्द से कहीं, वह कुसिनारा के मल्लों को सूचित
करना था कि तथागत का वहाँ आगमन हुआ है और रात्रि के अन्तिम प्रहर में
उनका महापरिनिर्वाण होगा।
- तुम उलाहना देने का कोई अवसर न देना। जिससे मल्ल कहने लगें, ‘‘हमारे
अपने गाँव में तथागत का महापरिनिर्वाण हुआ है और हमें पता भी नहीं लगा
तथा हमें उनके अन्तिम समय दर्शन करने का कोई अवसर नहीं मिला।’’ 26. तत्पश्चात् भदन्त अनुरूद्ध्र और भदन्त आनन्द ने धार्मिक प्रवचन में ही रात्रि का
शेष भाग व्यतीत किया।
- और रात्रि के तीसरे पहर में, जैसा कि पहले ही घोषित किया जा चुका था,
तथागत ने अपनी अन्तिम साँस ली और महापरिनिर्वाण प्राप्त किया। 28. जब तथागत का महापरिनिर्वाण हो गया, तो कुछ भिक्षुओं और आनन्द ने बाँहें
पसार कर रोना प्रारम्भ कर दिया, कुछ तो दुखाभिभूत होकर जमीन पर भी गिर
पड़े और दुख में जमीन पर लोट-पोट कर, कहने लगे, ‘‘बहुत शीघ्र महापरिनिर्वाण
हो गया। बहुत शीघ्र तथागत का अस्तित्व विलीन हो गया। बहुत शीघ्र संसार
से प्रकाश लुप्त हो गया!’’
- यह बैशाख-पूर्णिमा की मध्यरात्रि थी, जब तथागत ने अपनी अन्तिम साँसें ली
थीं, उनके महापरिनिर्वाण का वर्ष ईसा पूर्व 483 था।
- जैसा कि पालि में कहते हैंः
दिवा तपति आदिच्चो रत्तिं आभाति चन्दिमा_
सन्नद्धो खत्तियों तपति झायी तपति ब्राह्मणो_
अथ सब्बंमहोसत्तं बुद्धो तपति तेज सा।।5।।387।। धम्मपद 31. ‘‘सूर्य केवल दिन में चमकता है, चाँद रात्रि को प्रकाशमान होता है। क्षत्रिय
शस्त्रधारी होने के समय ही चमकता है। और ब्राह्मण तभी चमकता है जब वह
समाधिस्थ होता है। परंतु बुद्ध अपने तेज से दिन और रात चमकते रहता है।’’ 32. ‘‘इसमें कुछ भी संदेह नहीं है कि वे संसार के प्रकाश-स्तम्भ थे।’’