504 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर सम्पूर्ण वाघ्मय
5. मल्लों का विलाप और एक भिक्षु की प्रसन्नता
- तथागत की इच्छानुसार, आनन्द गये और मल्लों को घटना के विषय में सूचित
किया।
- जब उन्होंने इस विषय में सुना तो मल्लों को, उनकी पत्नियों को, उनके युवक
व युवतियों को भारी दुःख हुआ और उदास हुए और सभी के हृदय को आघात
पहुँचा।
- उनमें से कुछ अपने बाल बिखेर कर और अपनी बाँहों को पसार कर रोने लगे
और दुःख से अभिभूत हो जमीन पर लोटने लगे।
- तब मल्ल लोग, अपने नवयुवकों, नवयुवतियों और पत्नियों सहित तथागत के
अन्तिम दर्शन करने के लिये उपवन के साल वृक्षों के समीप गये। 5. तब भदन्त ने सोचा, यदि मैं कुसीनारा के मल्लों को एक-एक करके अनुमति दूंगा
तो तथागत के मृत शरीर को श्रद्धांजलि देने में उन्हें अत्यंत समय लगेगा।’’ 6. अतः उन्होंने उन्हें समूहों में, परिवार-दर-परिवार, व्यवस्थित करने का निर्णय
लिया। तब प्रत्येक परिवार ने नम्रता से तथागत के चरणों में शीश नवाकर और
विदा ली।
- उस समय भदन्त महाकाश्यप एक विशाल भिक्षु-संघ सहित पावा से कुसीनारा
की ओर राजपथ पर यात्रा कर रहे थे।
- ठीक उसी समय नग्न परिव्राजक पावा की ओर राजपथ से आ रहा था।
- भदन्त महाकाश्यप ने नग्न परिव्राजक को दूर से आते देखा, तो वे उस
नग्न परिव्राजक से बोले, ‘‘हे मित्र! निश्चय ही तुम हमारे शास्ता को जानते
होंगे?’’
- ‘‘हां मित्र! मैं उन्हें जानता हूँ।’’ आज श्रमण गौतम का महापरिनिर्वाण हुए एक
सप्ताह हो गया है!
- यह समाचार सुनते ही तुरन्त भिक्षु-गण दुःख से अभिभूत हो गये और रोना
प्रारम्भ कर दिया।
- उस समय सुभद्र नामक एक भिक्षु, जो अपनी वृद्धावस्था में संघ में प्रविष्ट
हुआ था, उनके साथ में था।
- सुभद्र ने भिक्षुओं को सम्बोधित किया और कहा, ‘‘बहुत हो गया भिक्षुओ! रोओ
मत और न विलाप करो। हम अब श्रमण गौतम से भली-भाँति मुक्त हो गये