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- ‘‘भगवान्! आप का शरीर श्रेष्ठ, समृद्ध आकर्षक है। आप स्वर्ण-वर्ण तथा ऐसे
दांतों से युक्त है, जिनसे स्वर्ण-रश्मियां निकलती हैं_ शरीर तेजस्विता से परिपूर्ण
है, शरीर पूर्णतः महापुरुष के बत्तीस लक्षणों से युक्त है।’’
- ‘‘आपकी स्पष्ट-दृष्टि और मनोहर, ऊंचे तथा सच्चे हैं। अपने अनुयायियों के
मध्य सूर्य के समान प्रकाशयुक्त इतने स्वर्ण-वर्ण हैं_ अपनी सुन्दरता एवं तारुण्य
को एकान्तवासी परिव्राजक के रूप में क्यों व्यर्थ कर रहे हैं?’’
- ‘‘चक्रवर्ती राजा के समान आपको राज करना चाहिए और निस्संदेह समुद्र तक
आपका राज्य होना चाहिए। अभिमानी राजाओं को आपके सामने नतमस्तक
होना चाहिए। आपको चक्रवर्ती राजा के समान मनुष्य मात्र पर शासन करना
चाहिए।’’
- ‘‘आनन्द तथागत के शरीर के वर्ण को अत्यधिक स्वच्छ और दीप्त वर्णित करते
हैं कि जब स्वर्णिम वस्त्र का जोड़ा उनके शरीर पर रखा जाता था तो वह भी
अपनी चमक खो बैठता था।’’
- तब इसमें कोई आश्चर्य नहीं कि वे अपने विरोधियों द्वारा एक जादूगर कहलाते
थे।
3. उनके नेतृत्व की सामर्थ्य
- भिक्षु-संघ का कोई वैधानिक अध्यक्ष नहीं था। तथागत का संघ के ऊपर कोई
प्रभुत्व नहीं था। भिक्षु-संघ एक स्वायत्तशासित संस्था थी।
- तो भी संघ और उसके सदस्यों पर तथागत की क्या स्थिति थी?
- इस विषय में हमारे पास तथागत के समकालीन दो लोगों, सकुलदायी और
उदायी के साक्ष्य हैं।
- एक बार तथागत राजगृह के वेणुवन में ठहरे हुए थे। एक दिन सुबह तथागत
भिक्षाटन के लिये राजगृह गये, किन्तु ‘अभी बहुत जल्दी है’ समझकर उन्होंने
परिव्राजकाराम में सकुलदायी के पास जाने की सोची और वहां वे चले गये। 6. उस समय, सकुलदायी परिव्राजकों के एक विशाल संघ के साथ बैठा था, जो
‘है’ या ‘नहीं’ है के विषय में जोर-जोर से चर्चा कर रहे थे। 7. ‘‘जब कुछ दूर से ही सकुलदायी ने तथागत को आते देखा, उसने यह कहकर
अपने साथियों को चुप करवाया, ‘‘शांत रहो शोर मत करो, श्रमण गौतम आ
रहे हैं, जो शांतिप्रिय हैं।’’