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- ‘‘(मिथ्या) दृष्टि की त्रुटि में न पड़कर, शीलवान बनकर और ज्ञानी होकर
तथा इन्द्रिय सुखों के प्रति आसक्ति को दूर करे, तो पुनः-पुनः गर्भ में नहीं
पड़ता।’’
- संक्षेप में, उन्होंने कहा, ‘‘अपने शत्रुओं से भी प्रेम करो।’’
2. दुखियों का दुःख दूर करने वाले महान् मानसिक चिकित्सक
(i)
विशाखा को दी गई सांत्वना
- विशाखा एक उपासिका थी। भिक्षुओं को भिक्षा देना उसकी दिनचर्या थी।
- एक दिन उसकी पोती सुद्दत जो उसके साथ रहती थी, बीमार पड़ी और मर
गयी।
विशाखा दुख सहन करने में असमर्थ थी।
अंत्येष्टि के पश्चात् वह बुद्ध के समीप गयी और आँखों में आँसू लिए हुए
उदास एक ओर बैठ गयी।
- तथागत ने पूछा, ‘‘हे विशाखा! तुम, इस प्रकार दुःखी और शोकाकुल आँखों से
आँसू गिराती हुई क्यों बैठी हो?’’
- उसने उन्हें यह कहते हुए अपनी पोती की मृत्यु के विषय में बताया, ‘‘वह
एक आज्ञाकारी लड़की थी और मुझे उस जैसी दूसरी नहीं मिल सकती।’’ 7. ‘‘हे विशाखा! कहो, श्रावस्ती में कितनी युवा लड़कियाँ निवास करती हैं?’’ 8. ‘‘भगवान्, लोग कहते हैं, वे कई कोटि (कई लाख) हैं।’’
‘‘यदि वे सब तुम्हारी पोती के समान होती, क्या तुम उन्हें प्यार नहीं करती?’’
‘‘निश्चय से भगवान्,’’ विशाखा ने उत्तर दिया।
‘‘और श्रावस्ती में प्रतिदिन कितनों की मृत्यु होती है?’’
‘‘अनेक, भगवान्।’’
‘‘तब तो कोई भी ऐसा क्षण नहीं होगा, जब तुम किसी न किसी के लिये दुःखी
न हो रही हो?’’
‘‘सत्य है, भगवान्।’’
‘‘तब क्या तुम दिन और रात रोती हुई व्यतीत करोगी?’’