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- तथागत ने अपने मौन द्वारा स्वीकृति दी। तत्पश्चात् तथागत ने स्वयं चीवर धरण
किया और चीवर-पात्र लेकर स्थविर वक्कली से भेंट करने के लिये गये। 5. जब स्थवर वक्कली ने तथागत को आते देखा, जो अभी कुछ दूरी पर ही थे,
और उनको देखकर वह अपने बिस्तर पर हिलने-डुलने लगा। 6. तब तथागत ने स्थविर वक्कली से कहा, ‘‘बहुत हो गया, वक्कली! अपने
बिस्तर पर मत हिलो-डुलो! ये आसन सुसज्जित है। मैं वहाँ बैठूंगा।’’ और वे
एक सुसज्जित आसन पर बैठ गये। तथागत बैठने के पश्चात् स्थविर वक्कली
से बोले-
- ‘‘अच्छा, वक्कली! मैं समझता हूँ कि तुम कष्ट को सहन कर रहे हो। मैं
समझता हूँ तुम बड़ी सहनशीलता से काम कर रहे हो। क्या तुम्हारी पीड़ा घट
रही है और बढ़ तो नहीं रही है। क्या इसके घटने का कोई लक्षण है और
उनके बढ़ने के तो नहीं हैं?’’
- ‘‘नहीं, भगवान्! मैं सहन नहीं कर पा रहा हूँ। मैं झेल नहीं पा रहा हूँ। मुझे
तीव्र कष्ट हो रहा है। वह घट नहीं रहा। उसके घटने के कोई लक्षण नहीं है,
बल्कि उसके बढ़ने के हैं।’’
- ‘‘वक्कली! क्या तुम्हें कोई सन्देह है? क्या तुम्हें कोई अनुताप है?’’
- ‘‘निस्संदेह भगवान!् मुझे कोई सन्देह नहीं है। मुझे कोई अनुताप नहीं है।’’
- ‘‘वक्कली! क्या तुम्हारे मन में ऐसी कोई बात तो नहीं है, जिसके आधार पर
तुम अपने शील का ध्यान कर स्वयं को, धिक्कारते हो?’’
- ‘‘नहीं भगवान्! ऐसा कुछ भी नहीं है, जिसके आधर पर मैं अपने शील का
ध्यान कर स्वयं को धिक्कारता।’’
- ‘‘तब वक्कली! यदि ऐसा है, तो तुम्हें अवश्य कुछ चिन्ता है, तुम्हें अवश्य
किसी न किसी बात का पश्चाताप है।’’
- ‘‘भगवान्! एक लम्बे समय से मैं तथागत के दर्शन करने की इच्छा रखता था,
किन्तु इस शरीर में पर्याप्त शक्ति नहीं थी कि तथागत के दर्शन के लिये आ
सकूँ।’’
- ‘‘वक्कली! शांत रहो मेरी इस तुच्छ देह में ऐसा क्या है, जिसके दर्शन किये
जायें? वह जो ‘धम्म’ को देखता है, वह मुझे देखता है, वक्कली! वह जो मुझे
देखता है, वह ‘धम्म’ को देखता है। वस्तुतः वक्कली! ‘धम्म’ को देख कर
कोई मुझे देखता है, मुझे देखकर कोई ‘धम्म’ को देखता है।’’