522 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर सम्पूर्ण वाघ्मय
(iii)
- ऐसा मैंने सुना है, तथागत एक बार भग्गी जनपद के मृगदाय में भेसकुला वन में
ठहरे हुए थे। तब गृहपति नकुल पिता तथागत के पास आया, उनका अभिवादन
कर एक ओर बैठ गया।
- वहाँ बैठ कर गृहपति, नकुल पिता ने तथागत को संबोधित किया और यह
कहा, ‘‘शास्ता! मैं एक जरा-जीर्ण वृद्ध मनुष्य, बूढ़ा वय प्राप्त हूँ, मैं जीवन के
अन्त तक पहुंच गया हूँ, मैं रोगी हूँ और सदैव बीमार रहता हूँ। शास्ता! मैं वह
हूँ, जिसे मुश्किल से ही तथागत तथा पूजनीय भिक्षुओं के दर्शन प्राप्त होते हैं।
तथागत मुझे प्रसन्न कर दें और सांत्वना दें, जिससे कि चिरकाल तक मेरे लिये
हितकर और सुखदायी हों।’’
- ‘‘यह सत्य है गृहपति! कि तुम्हारा शरीर दुर्बल और कष्टों से लदा हुआ है। इस
तरह का शरीर लिये हुए किसी के लिये, गृहपति! एक भी क्षण का स्वास्थ्य
प्राप्त करने का दावा करना मात्र मूर्खता होगी। यद्यपि, गृहपति! तुम्हें स्वयं को
इस प्रकार प्रशिक्षित करना चाहिये, ‘यद्यपि मेरा शरीर रुग्ण है, मेरा चित्त रुग्ण
नहीं होना चाहिये’। इस प्रकार, गृहपति! तुम्हें स्वयं को ऐसा अभ्यास करना
चाहिये।’’
- तब गृहपति नकुल पिता ने स्वागत किया और बड़ी प्रसन्नता से तथागत के
वचनों को सुना, और अपने स्थान से उठकर उसने उनका अभिवादन किया
और प्रदक्षिणा की ओर वहां से चला गया।
(iv)
- एक बार तथागत शाक्यों के मध्य कपिलवस्तु में अंजीर-वृक्ष उद्यान में ठहरे हुए
थे।
- तब उस अवसर पर कुछ भिक्षु तथागत के लिये चीवर बनाने में व्यस्त थे,
उनका कहना था, ‘‘क्योंकि जब तीन महीने व्यतीत हो जायेंगे, उनका चीवर
तैयार हो जाने पर, तथागत अपनी चारिका पर निकल जायेंगे।’’
- तब महानाम शाक्य ने यह सुनते हुए कहा, ‘‘कुछ भिक्षु चीवर बनाने में व्यस्त
हैं, इत्यादि’’ ..........और वे तथागत के पास गये, उनका अभिवादन किया और
एक ओर बैठ गये। इस प्रकार बैठे हुए, महानाम शाक्य ने कहा-
- ‘‘भगवान्! मैंने ऐसा सुना है कि कुछ भिक्षु तथागत के लिये चीवर बनाने में
व्यस्त हैं, यह कहते हुए, ‘जब चीवर तैयार, तो हो जायेगा तीन महीने के अन्त