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में, तथागत अपनी चारिका पर निकल जायेंगे’ अब भगवान! हमने कभी तथागत
से यह कभी नहीं सुना कि एक विवेकी उपासक, जो रुग्ण है, कष्ट में हैं,
दुःखद स्थिति में है, उसको एक दूसरे विवेकी उपासक द्वारा कैसे प्रसन्न किया
जा सकता है।’’
- ‘‘एक विवेकी उपासक, महानाम! जो रुग्ण है..... एक दूसरे विवेकी उपासक
द्वारा चार सुखद आश्वासनों द्वारा प्रसन्न किया जाना चाहिये जो इस प्रकार है,
‘सान्त्वना रखो, भले मानुष, धम्म में और भिक्षुओं के संघ में, इसी प्रकार ध
म्म के प्रिय शीलों में जो अखण्डित और अदूषित रहने पर चित्त को शान्ति देते
हैं।’’
- ‘‘तब, महानाम! जब एक विवेकी उपासक जो रुग्ण है, उसे इस प्रकार एक
दूसरे उपासक द्वारा चार सुखद आश्वासनों से प्रसन्न कर दिया जाये, तो उसे
आगे इन शब्दों का प्रयोग करना चाहिये-’’
- ‘‘मान लो कि मरणासन्न व्यक्ति को अपने माता-पिता को देखने के लिए
व्याकुल है, तो दूसरे को उत्तर देना चाहिये कि ‘मेरे मित्र! तुम्हारी मृत्यु समीप
है। भले ही तुम्हें अपने माता-पिता को देखने की तीव्र इच्छा है या नहीं है, तुम
मृत्यु को प्राप्त करोगे। इसलिये तुम्हारे लिये यही अच्छा होगा कि तुम अपने
माता-पिता को देखने की इच्छा का त्याग कर दो।’’
- ‘‘और माल लो रुग्ण व्यक्ति कहता है, ‘कि माता-पिता की देखने की इच्छा
अब त्याग दी है।’ तो दूसरे को उत्तर देना चाहिये, कि मित्र! अभी तुम्हारे में
बच्चों की देखने की इच्छा है। क्योंकि किसी भी हाल में तुम अवश्य मृत्यु को
प्राप्त करोगे, इसलिये तुम्हारे लिये यहीं अच्छा होगा कि तुम अपने बच्चों को
देखने की इच्छा का त्याग कर दो।’’’
- ‘‘और इसी प्रकार उसे पाँचों इन्द्रिय सुखों के विषय में कहना चाहिये। मान
लो रुग्ण व्यक्ति कहता है, ‘मुझे पाँच इन्द्रिय-सुखों की उत्कंठा हैं’, तो दूसरे
को कहना चाहिये, ‘मेरे मित्र! इन पाँच इन्द्रिय-सुखों की अपेक्षा दिव्य-लोक
के सुख अधिक श्रेष्ठ हैं और उनमें अधिक विकल्प हैं। इसलिये तुम्हारे लिये
यही अच्छा होगा कि तुम मानुषिक सुखों से अपना चित्त हटाओ और उसे आप
दिव्य-लोक के सुखों पर केन्द्रित करो।’’
- ‘‘पुनः यदि रुग्ण व्यक्ति कहता है, ‘मेरा चित्त दिव्य-लोक के सुखों पर केन्द्रित
है, तो दूसरे को कहना चाहिये, अपने चित्त को ब्रह्म-लोक पर केन्द्रित करना
बेहतर है,’ और तब यदि रुग्ण व्यक्ति का चित्त उस प्रकार केन्द्रित होता है तो
दूसरे को कहना चाहिये-’’