4. असहनशीलों के प्रति सहनशीलता - Page 553

524 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर सम्पूर्ण वाघ्मय

  1. ‘‘मित्र! ब्रह्म लोक भी अनित्य है, परिवर्तनशील है, उसमें भी ममत्व हो सकता

है। मित्र! तुम्हारे लिये अच्छा होगा, यदि तुम अपने चित्त को ब्रह्म-लोक से

भी ऊपर उठाओ और ममत्व के उच्छेदन पर केन्द्रित करो।’’ 12. ‘‘और यदि रुग्ण व्यक्ति कहे कि उसने ऐसा कर लिया है, तब मैं घोषित करता

हूँ महानाम! कि उस उपासक में जो इस प्रकार निश्चयपूर्वक कहता है और

श्रावक में जिनका चित्त आस्रवों से मुक्त है इन दोनों के मध्य कोई अन्तर नहीं

है।’’

4. असहनीय के प्रति सहनशीलता

  1. एक बार तथागत यक्ष आलवक के क्षेत्र में आलवी नगर में निवास कर रहे थे।

तब यक्ष आलवक तथागत के पास आया, और उनके पास आकर, इस प्रकार

बोला, ‘‘हे श्रमण! बाहर निकल जाओ।’’

  1. तथागत यह कहते हुए चल पड़े, ‘‘बहुत अच्छा, मित्र।’’

  2. यक्ष ने फिर आज्ञा दी, ‘‘श्रमण! भीतर आ जाओ।’’

  3. तथागत ने यह कहते हुए प्रवेश किया, ‘‘बहुत अच्छा मित्र।’’

  4. दूसरी बार भी यक्ष आलवक ने तथागत से कहा, ‘‘श्रमण! बाहर निकल

जाओ।’’

  1. तथागत यह कहते हुए चल पड़े, ‘‘बहुत अच्छा मित्र।’’

  2. ‘‘हे श्रमण! भीतर आ जाओ,’’ यक्ष ने दूसरी बार कहा।

  3. तथागत ने यह कहते हुए प्रवेश किया, ‘‘बहुत अच्छा मित्र।’’

  4. तीसरी बार भी यक्ष आलवक ने तथागत से कहा, ‘‘हे श्रमण! बाहर निकल

जाओ।’’

  1. तथागत यह कहते हुए चल पड़े, ‘‘बहुत अच्छा मित्र।’’

  2. ‘‘हे श्रमण! भीतर आ जाओ,’’ यक्ष ने पुनः कहा।

  3. तथागत ने यह कहते हुए प्रवेश किया, ‘‘बहुत अच्छा मित्र।’’

  4. चौथी बार भी यक्ष ने तथागत से कहा, ‘‘हे श्रमण! बाहर निकल जाओ।’’

  5. इस बार तथागत ने उत्तर दिया, ‘‘मैं बाहर नहीं निकलूँगा, मित्र! तुम जो चाहे

वह कर सकते हो।’’