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न हो, तो क्या कामना उत्पन्न होगी? यदि कामना न हो, तो क्या दुराग्रह होगा?
यदि दुराग्रह न हो, तो क्या व्यक्तिगत संपत्ति के लिए प्रेम पैदा होगा? यदि
संपत्ति ही न हो, तो क्या अधिक संपत्ति के लिए लोभ पैदा होगा?’’ 15. ‘‘भगवान्! नहीं होगा।’’
- ‘‘यदि निजी संपत्ति के लिए आसक्ति न हो, तो क्या संसार में शांति नहीं
होगी?’’
‘‘भगवान्! होगी।’’
तब तथागत ने कहा, ‘‘मैं पृथ्वी को पृथ्वी मानता हूं। लेकिन मेरे मन में इसके
लिए कोई तृष्णा नहीं है।’’
- ‘‘इसलिए मैं कहता हूं कि सभी तृष्णाओं का मूलोच्छेद कर देने से, उनके
पीछे न भागने से, बल्कि उनका नाश कर देने और त्याग कर देने से, उनका
परित्याग कर देने से ही मुझे ‘बुद्धत्व’ लाभ प्राप्त हुआ।
- ‘‘भिक्षुओ! भौतिक वस्तुओं के नहीं, किन्तु मेरे धम्म के उत्तराधिकारी बनो,
क्योंकि तृष्णा से आसक्ति पैदा होती है और आसक्ति चित्त को दास बनाती
है।’’
- इन शब्दों में भगवान् बुद्ध ने आनन्द थेर तथा अन्य भिक्षुओ को संग्रह करने
की प्रवृत्ति के दुष्परिणाम समझाए।
3. उन्हें सुसंगति पसंद थी
- भगवान्! बुद्ध को सुसंगति इतनी अधिक प्रिय थी कि उन्हें ‘सुसंगति प्रेमी बुद्ध’
का उपनाम दिया जा सकता है।
- इसलिए उन्होंने अपने अनुयायियों को शिक्षा दी, ‘‘कल्याण मित्रों की संगति में
रहो।’’
- भगवान् बुद्ध ने सभी भिक्षुओं को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा-
- ‘‘भिक्षुओ! मैं कोई दूसरी एक भी ऐसी बात नहीं जानता, जिसमें इतनी शक्ति हो
कि वह अनुत्पन्न कुशल धम्मों को उत्पन्न कर सके अथवा उत्पन्न अकुशल ध
म्मों को निस्तेज कर सके, किन्तु ऐसी शक्ति सुसंगति के साथ मित्रता में है।’’ 5. ‘‘जो सुसंगति का प्रेमी है, उसमें अनुत्पन्न कुशल धम्म उत्पन्न हो जाते हैं और
उत्पन्न अकुशल धम्म निस्तेज हो जाते हैं। अकुशल धम्म से अनुरक्ति निस्तेज