1. भगवान् बुद्ध की प्रशस्ति - Page 567

538 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर सम्पूर्ण वाघ्मय

  1. प्रोफेसर डेविड गोडर्ड कहते हैं-

  2. ‘‘विश्व के समस्त धार्मिक संस्थापकों में से केवल भगवान् बुद्ध को यह गौरव

प्राप्त है कि उन्होंने मनुष्य में मूलतः विद्यमान उस निहित शक्ति को पहचाना,

जो कि बिना किसी बाह्य निर्भरता के उसे मुक्ति के मार्ग पर अग्रसर कर सकती

है।’’

  1. ‘‘यदि एक वास्तविक महान पुरुष का महात्म्य इसी बात में है कि समस्त

मानव-मात्र के महत्त्व को ऊँचा उठाने में निहित है, तो वास्तविक महान कहलाने

के लिये तथागत से बढ़कर अन्य कौन हकदार है।’’

  1. ‘‘जिन्होंने किसी अन्य ‘बाह्य शक्ति’ को मनुष्य के ऊपर स्थापित कर उसे निम्न

दर्जे पर पहुँचाने के स्थान पर, उसे प्रज्ञा और मैत्री के सर्वोच्च शिखर तक ऊँचा

उठा दिया है।’’

  1. ‘बुद्धिज्म़’ (बौद्ध धर्म) नामक पुस्तक के लेखक श्री ई. जे. मिल्स का कथन

है-

  1. ‘‘किसी भी अन्य धर्म में ‘विद्या’ को इतना महत्त्व नहीं दिया गया और अविद्या

(अज्ञान) की इतनी भर्त्सना नहीं की गई, जितनी बुद्धधाम में।’’ 50. ‘‘किसी भी अन्य धर्म में अपनी आँखें खुली रखने पर इतना अधिक बल नहीं

दिया गया है।’’

  1. ‘‘किसी भी अन्य धर्म ने मानसिक-संस्कृति के संवर्धन के लिये इतनी गहराई

तक व्यवस्थित योजना नहीं बनायी है।’’

  1. प्रोफेसर डब्ल्यू, टी. स्टेस अपने ‘बुद्धिस्ट एथिक्स (बौद्ध नीतिशास्त्र) नामक

पुस्तक में कहते हैं-

  1. ‘‘बौद्ध धम्म का नैतिक आदर्श-पुरुष ‘अर्हत’ न केवल अर्हत, की दृष्टि से,

बल्कि सदाचार और बौद्धिक विकास की दृष्टि से महान होना चाहिये।’’ 54. ‘‘उसे एक दार्शनिक के साथ ही साथ एक अच्छे आचरण का मनुष्य भी होना

चाहिये।’’

  1. ‘‘बौद्ध धर्म के द्वारा सदैव ही ‘विद्या’ (ज्ञान) को मुक्ति के लिये अनिवार्य माना

गया है तथा ‘अविद्या’ (अज्ञान) और ‘तृष्णा’ को निर्वाण का प्रधान बाधक

कारण स्वीकार किया है।’’

  1. ‘‘इसके विपरीत ईसाई आदर्श पुरुष के लिये ज्ञान का होना कभी भी आवश्यक

अंग नहीं माना है।’’