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- ‘‘क्यों इसके संस्थापक का अदार्शनिकचरित्र था, जिसके कारण ईसाई धर्म
वैचारिक-व्यवस्था में मनुष्य का नैतिक पहलू बौद्धिक पहलू से अलग कर दिया
गया है।’’
- ‘‘संसारी दुःखों के मूल में धृष्टता से कहीं अधिक अज्ञानता और अन्ध-विश्वास
का हाथ रहा है।’’
‘‘भगवान् बुद्ध ने इसकी अनुमति नहीं दी थी।’’
‘‘यह दर्शाने के लिये इतना पर्याप्त है कि भगवान् बुद्ध और उनका धम्म कितना
महान् और कितना अनुपम है।’’
- कौन ऐसा होगा, जो भगवान् बुद्ध को अपना शास्ता स्वीकार नहीं करना
चाहेगा।
2. उनके धम्म के प्रचार की शपथ
- प्राणी असीमित (एवं अनंत) है_ आओ हम उन सभी को भवसागर से पार
उतारने की शपथ लें।
- हम में असंख्य कमजोरियां हैं, आओ हम उन सभी को मिटा देने की शपथ
लें।
- सत्य अनन्त हैं_ आओ हम उन सभी को समझने की शपथ लें।
- बुद्ध का मार्ग अनुपम एवं अतुलनीय है_ आओ हम पूर्णता से उसे निष्पादित
करने की शपथ लें।
3. भगवान् बुद्ध के पुनः स्वदेश लौट आने की प्रार्थना
- हे महामानव! मैं आप पर सम्पूर्ण हृदय से विश्वास के साथ आपकी शरण ग्रहण
करता हूँ, जिनकी ज्योति चारों ओर बिना किसी बाधा के, दस दिशाओं में
व्याप्त है, और अपनी गम्भीर इच्छा व्यक्त करता हूँ कि आपके (ज्ञान) लोक
में जन्म लूँ।
- आपके लोक के लोक की जब मैं कल्पना करता हूं, तो पाता हूँ कि वह सभी
लोकों से बढ़कर है।
- यह बिना किसी सीमा के आकाश के समान विशाल और विस्तृत सभी को
अपने में समेटे हुए है।