15. देश छोड़ जाने का प्रस्ताव - Page 57

28 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर सम्पूर्ण वाघ्मय

  1. इसलिए प्रस्ताव और संशोधन दोनों मतदान के लिए रखे गए। पहले सिद्धार्थ

के संशोधन को मतदान के लिए रखा गया, वह भारी बहुमत से अमान्य हो

गया।

  1. उसके बाद सेनापति ने अपने प्रस्ताव पर मत माँगे। सिद्धार्थ गौतम इसके विरोध

में फिर खड़ा हुआ और उसने कहा-‘‘मेरी प्रार्थना है कि संघ इस प्रस्ताव को

स्वीकार न करे। शाक्य कोलियों के निकट संबंधी हैं। एक दूसरे को बरबाद

करना मूर्खता है।’’

  1. सेनापति ने सिद्धार्थ गौतम के तर्क का सर्वथा विरोध किया। उसने इस बात

पर जोर दिया कि युद्ध में क्षत्रिय के लिए कोई अपना और पराया नहीं होता।

साम्राज्य की रक्षा के लिए उन्हें अपने भाइयों से भी संघर्ष करना चाहिए।

  1. यज्ञ करना ब्राह्मणों का, युद्ध करना क्षत्रियों का, व्यापार करना वैश्यों का और

सेवा करना शूद्रों का धर्म है। हर वर्ग को अपना धर्म निभाने में पुण्य मिलता

है। यही शास्त्र का आदेश है।

  1. सिद्धार्थ ने उत्तर दिया-‘‘जहाँ तक मैंने धर्म को समझा है, वह इसे समझने में है

कि वैर से वैर कभी शान्ति नहीं होता। वैर केवल प्रेम से ही शान्त हो सकता

है।’’

  1. अधीर होकर सेनापति ने कहा-‘‘इस प्रकार के दार्शनिक शास्त्रार्थ में पड़ना

एकदम बेकार है। सिद्धार्थ को मेरा प्रस्ताव अमान्य है। हम संघ का मत लेकर

इसका निश्चय करें कि इस पर संघ का क्या विचार है।’’

  1. सेनापति ने अपना प्रस्ताव मत लेने के लिए रखा। भारी बहुमत से प्रस्ताव पास

हो गया।

15. देश छोड़ने का प्रस्ताव

  1. संघ द्वारा सैन्य संगठन पर विचार करने के लिए अगले दिन सेनापति ने शाक्य

संघ की सभा बुलाई।

  1. जब संघ मिला तो उसने इस प्रस्ताव के पास करने की घोषणा की कि कोलियों

के विरुद्ध युद्ध में बीस से पचास वर्ष के प्रत्येक शाक्य के शामिल होने का

आदेश जारी हो।

  1. सभा में दोनों पक्ष उपस्थित थे-वे भी जिन्होंने संघ की पहली सभा में युद्ध घोषणा

के पक्ष में मत दिया था और वे भी जिन्होंने इसके विरुद्ध मत दिया था।