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- जिन्होंने प्रस्ताव के समर्थन में मत दिया था, उन्हें सेनापति के प्रस्ताव को स्वीकार
करने में कोई कठिनाई नहीं थी। पहले के निर्णय का यह सहज परिणाम था।
- लेकिन जिन्होंने प्रस्ताव के विरोध में मत किया था, उन अल्पसंख्यकों के सामने
समस्या यह थी कि वे बहुमत के निर्णय को स्वीकार करें या न करें।
- अल्पमत वाले बहुमत के सामने सर झुकाने को तैयार नहीं थे। यही कारण था,
जिसके चलते वे सभा में उपस्थित थे। दुर्भाग्यवश किसी में भी खुलकर कहने
का साहस न था। शायद वे बहुमत के विरोध करने का परिणाम जानते थे।
- अपने समर्थकों को चुप बैठा देखकर सिद्धार्थ खड़ा हुआ और संघ को सम्बोधित
करके कहा-‘‘मित्रो!, जो आपकी इच्छा हो, करें। आपका और बहुमत है, लेकिन
मुझे खेद है कि मैं इस सैन्य संगठन का विरोध करूँगा। मैं न तो आपकी सेना
में शामिल होऊँगा और न ही युद्ध में भाग लूँगा।’’
- सिद्धार्थ गौतम को उत्तर देते हुए सेनापति ने कहा-‘‘संघ के सदस्य बनते समय
ली गई शपथ को आप याद करें। किसी एक को भी तुमने तोड़ा तो तुम्हें
सार्वजनिक निन्दा का शिकार बनना पड़ेगा।’’
- सिद्धार्थ ने उत्तर दिया-‘‘हाँ, मैंने तन, मन, धन से शाक्यों के सर्वोत्तम हितों की रक्षा
का वचन दिया है। लेकिन मुझे लगता है कि यह युद्ध शाक्यों के सर्वोत्तम हित में
नहीं है। शाक्यों के सर्वोत्तम हितों के मुकाबले मेरे लिए सार्वजनिक निन्दा क्या है?’’
- सिद्धार्थ ने संघ को याद दिलाते हुए सावधान किया कि किस प्रकार कोलियों
से लड़ाई करते रहने के कारण शाक्य लोग कोसल-नरेश के जागीरदार जैसे
हो गए हैं। उसने कहा-‘‘इसकी कल्पना करना आसान है कि यह युद्ध कोसल
नरेश को शाक्यों की स्वतंत्रता घटाने का अवसर देगा।’’
- सेनापति क्रोधित हो गया और उसने सिद्धार्थ को सम्बोधित करते हुए कहा-‘‘तुम्हारी
वाकपटुता तुम्हारी सहायता नहीं करेगी। शायद तुम सोच रहे हो कि कोसल
देश की अनुमति के बिना संघ की अवहेलना करने वाले को संघ मृत्यु-दण्ड
या देश-निकाले की सजा नहीं दे सकता और यदि दोनों में से कोई भी सजा
तुम्हें मिल जाती है, तो कोसल-नरेश उसकी अनुमति नहीं देंगे।’’
- ‘‘लेकिन याद रखो, संघ के पास तुम्हें सजा देने के दूसरे रास्ते भी हैं। संघ तुम्हारे
परिवार के विरुद्ध सामाजिक बहिष्कार की घोषणा कर सकता है। संघ तुम्हारे
परिवार को भूमि से बेदखल कर सकता है। इसके लिए संघ को कोसल-नरेश
से अनुमति लेने की कोई आवश्यकता नहीं है।’’