16. प्रव्रज्या ही समाधन - Page 59

30 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर सम्पूर्ण वाघ्मय

  1. सिद्धार्थ कोलियों के विरुद्ध संघ की युद्ध-घोषणा का विरोध करते रहने के

परिणाम को समझ रहा था। उसके पास सोचने के तीन विकल्प थे-सेना में

भर्ती होकर युद्ध में भाग लेना, मृत्यु-दण्ड या देश-निकाले के लिए राजी होना

या अपने परिवार के सदस्यों के सामाजिक बहिष्कार का तिरस्कार झेलना व

सम्पत्ति से हाथ धोने के लिए राजी करना।

  1. पहले विकल्प को स्वीकार करने के लिए वह किसी स्थिति में तैयार नहीं था।

इसी तरह तीसरे के बारे में भी वह नहीं सोच सकता था। इन परिस्थितियों में

उसे लगा कि दूसरा विकल्प ही उसके लिए सर्वाधिक मान्य था।

  1. तब सिद्धार्थ ने संघ से कहा-‘‘कृपया! मेरे परिवार को दण्डित न करें। सामाजिक

बहिष्कार कर उन्हें विपत्ति में न डालें। उनकी भूमि छीनकर उन्हें निःसहाय न

बनाएँ, क्योंकि भूमि ही उनकी जीविका का एकमात्र साधन है। वे निर्दोष हैं,

दोषी मैं हूँ। मेरी गलती के लिए मुझे अकेले दण्डित होने दें। मृत्यु-दण्ड या

देश-निकाला में से जो आप चाहें मुझे सजा दें। मैं स्वेच्छा से उसे स्वीकार

करूँगा और मैं आपको वचन देता हूँ कि मैं इसके लिए कोसल-नरेश से

शिकायत नहीं करूँगा।

16. प्रव्रज्या-अभिनिष्क्रमण

  1. सेनापति ने कहा-‘‘तुम्हारा सुझाव मानना कठिन है। यदि तुम मृत्यु-दण्ड या

देश-निकाले की सजा स्वेच्छा से भी पाओगे, तो भी निश्चित रूप से कोसल-नरेश

को इसकी जानकारी हो जाएगी और वह निश्चितापूर्वक इसी परिणाम पर पहुँच

जाएगा कि संघ ने ही यह सजा दी है और वह संघ के विरुद्ध कार्यवाही

करेगा।’’

  1. सिद्धार्थ गौतम ने कहा-‘‘यदि यही कठिनाई है, तो मैं देश से बाहर निकलने

का सुझाव आसानी से दे सकता हूँ। मैं परिव्राजक बनकर देश छोड़ दूँगा। यह

भी एक तरह से देश निकाला ही है।’’

  1. सेनापति ने सोचा कि यह एक अच्छा सुझाव है। लेकिन सिद्धार्थ के बारे में

उसे अभी संदेह था कि सही रूप से वह इसे पूरा करेगा।

  1. इसलिए सेनापति ने सिद्धार्थ से पूछा-‘‘तुम अपने माता-पिता और अपनी पत्नी

की अनुमति के बिना परिव्राजक कैसे बन सकते हो?’’

  1. सिद्धार्थ ने विश्वास दिलाया कि वह अनुमति लेने का पूरा प्रयास करेगा और