32 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर सम्पूर्ण वाघ्मय
17. विदाई के शब्द
- शाक्य संघ की सभा में जो कुछ हुआ इसका समाचार सिद्धार्थ गौतम के वापिस
पहुँचने से पहले ही राज-महल में पहुँच गया था।
- घर पहुँचकर उसने देखा कि उसके माता-पिता काफी दुःखी हैं और रो रहे
हैं।
- शुद्धोधन ने कहा-‘‘हम लोग युद्ध के दुष्परिणाम की चर्चा करते थे। लेकिन
मैंने यह कभी नहीं सोचा था कि तुम इस सीमा तक चले जाओगे।’’
- सिद्धार्थ ने उत्तर दिया-‘‘मैंने भी नहीं सोचा था कि बात यहाँ तक बढ़ जाएगी। मुझे
आशा थी कि शांति के लिए मैं अपने तर्क द्वारा शाक्यों को मना लूँगा।’’
- ‘‘दुर्भाग्यवश सैनिक अधिकारियों ने लोगों की भावनाओं को इतना भड़का दिया
था कि उन पर मेरे तर्कों का कुछ भी असर नहीं पड़ा।’’
- ‘‘लेकिन, मुझे उम्मीद है कि आप यह महसूस करते होंगे कि मैंने स्थिति को
और अधिक खराब होने से कैसे बचा लिया। मैंने सत्य और न्याय को नहीं
छोड़ा है, जिस पर अडि़ग रहने की जो सजा होगी, उसे अपने ऊपर लेने में मैं
सफल हो गया।’’
- शुद्धोदन इससे संतुष्ट नहीं था और बोला-‘‘तुमने यह नहीं सोचा कि इससे
हम लोगों पर क्या गुजरेगी?’’ सिद्धार्थ ने उत्तर दिया-‘‘लेकिन इसीलिए तो मैं
परिव्राजक बनने के लिए तैयार हुआ। जरा सोचिए! यदि शाक्यों ने आपकी भूमि
छीन लेने का आदेश दे दिया होता को क्या होता।’’
- ‘‘लेकिन तुम्हारे बिना यह भूमि किस काम की है?’’ शुद्धोदन गुस्से में बोला-‘‘पूरा
परिवार ही तुम्हारे साथ देश निकाले पर क्यों न चले?’’
- रोती हुई प्रजापति गौतमी भी शुद्धोदन के तर्क को समर्थन देती हुई बोली-‘‘मैं
भी सहमत हूँ। हम लोगों को इस हाल में छोड़कर तुम अकेले कैसे जा सकते
हो?’’
- सिद्धार्थ ने कहा-‘‘माँ, क्या तुम हमेशा यह दावा नहीं करती हो कि तुम एक
क्षत्रिय की माँ हो? क्या ऐसा नहीं है? तुम्हें अब वीरता का परिचय देना चाहिए।
इस प्रकार दुःखी होना तुम्हें शोभा नहीं देता है। यदि मैं युद्ध-भूमि में जाता
और मारा जाता, तो तुम क्या करती? क्या तुम तब भी इसी तरह दुखी हुई
होती?’’