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- गौतमी ने उत्तर दिया-‘‘नहीं, वैसा तो क्षत्रिय धर्म के प्रतिकूल होता। लेकिन अब
तुम लोगों से बहुत दूर जंगल जा रहे हो, जहाँ तुम जंगली जानवरों के साथ
रहोगे, तो हम लोग यहाँ शाँति से कैसे रह सकते हैं?’’
- उसने गौतमी से कहा-‘‘मैं तुम लोगों को अपने साथ कैसे ले जा सकता हूँ?
नन्द अभी बच्चा है। मेरा बेटा राहुल अभी पैदा हुआ है। क्या आय इन्हें यहाँ
छोड़कर मेरे साथ जा सकती हो?’’
- गौतमी संतुष्ट नहीं हुई। उसने अर्ज किया-‘‘यह संभव है कि हम लोग सभी
शाक्य देश छोड़कर कोसल-नरेश के संरक्षण में कोसल-देश चलें।’’
- सिद्धार्थ ने कहा-‘‘लेकिन माँ! शाक्य लोग क्या कहेंगे? क्या वे इसे देशद्रोह
नहीं समझेंगे? इसके अलावा, मैंने प्रतिज्ञा की है कि मैं वचन से या कर्म से
ऐसा कुछ नहीं करूँगा, जिससे कोसल-नरेश को मेरी प्रव्रज्या के सही कारण
की जानकारी हो सके।’’
- ‘‘यह सही है कि मुझे अकेले जंगल में रहना पड़ेगा। लेकिन जंगल में रहना
या कोलियों के विरुद्ध लड़ाई में हिस्सा लेना-दोनों में से क्या अच्छा है?’’ 16. ख्शुद्धोदन ने पूछा-‘‘लेकिन इतनी जल्दी क्या है? शाक्य संघ ने लड़ाई की, ख्तिथि,
कुछ समय के लिए रोक दी है।’’
- ‘‘शायद, लड़ाई शुरू ही न हो। तुम अपनी प्रव्रज्या को क्यों नहीं स्थगित कर
देते? ऐसा भी संभव है कि शाक्यों के साथ रहने की अनुमति संघ में मिल
जाए।
- सिद्धार्थ को यह विचार बिल्कुल पसंद नहीं था। उसने कहा-‘‘मैंने प्रव्रज्या लेने
की प्रतिज्ञा की है, इसलिए संघ ने कोलियों के विरुद्ध युद्ध की घोषणा रोक
दी है।’’
- ‘‘यह भी संभव है कि मेरी प्रव्रज्या के बाद संघ को युद्ध की घोषणा वापस
लेने के लिए मना लिया जाए। किन्तु ये सब पहले मेरे प्रव्रज्या ले लेने पर ही
निर्भर करता है।’’
- ‘‘मैंने वचन दिया है और मुझे उसे अवश्य पूरा करना चाहिए। वचन तोड़ने का परिणाम
बहुत बुरा हो सकता है-हम लोगों के लिए भी और शांति पक्ष के लिए भी।’’
- ‘‘माँ! मेरा रास्ता न रोको। अपनी अनुमति और आशीर्वाद मुझे दो। जो हो रहा
है, वह अच्छे के लिए हो रहा है।’’