34 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर सम्पूर्ण वाघ्मय
गौतमी और शुद्धोदन चुप रहे।
अब सिद्धार्थ यशोधरा के कमरे में गया। उसे देखकर वह चुप खड़ा रहा। उसे
समझ नहीं आ रहा था कि उससे कैसे बोले और क्या बोले। यशोधरा ने चुप्पी
तोड़ी-‘‘कपिलवस्तु में संघ की सभा में जो कुछ हुआ है, उसे मैंने सुन रखा
है।’’
- सिद्धार्थ ने उससे पूछा-‘‘यशोधरा! मुझे बताओ कि प्रव्रज्या लेने के मेरे निर्णय
के बारे में तुम्हारा क्या विचार है?’’
- सिद्धार्थ समझते थे कि यशोधरा हिम्मत हार जाएगी। लेकिन वैसा कुछ नहीं
हुआ।
- अपनी भावनाओं को नियंत्रित कर उसने उत्तर दिया, ‘‘यदि मैं तुम्हारी जगह
होती, तो इसके अतिरिक्त मैं और कर ही क्या सकती थी? कोलियों के विरुद्ध
युद्ध-पक्ष में मैं निश्चित रूप से नहीं होती।’’
- ‘‘तुम्हारा निर्णय सही है। मैं तुम्हें अपनी अनुमति और सहयोग देती हूँ। मैं भी
तुम्हारे साथ प्रव्रज्या ग्रहण करती। लेकिन केवल राहुल की देखभाल के लिए
ही मैं ऐसा नहीं कर पाऊँगी।’’
- अच्छा होता यदि ऐसा न हुआ होता। लेकिन स्थिति का सामना करने के
लिए हमें दृढ़ और वीरवत् होना चाहिए। तुम अपने माता-पिता और अपने
पुत्र की चिंता न करो। जब तक मैं जीवित रहूँगी, उन लोगों की देखभाल
करती रहूँगी।
- ‘‘अपने निकट और प्रियजनों को छोड़कर परिव्राजक बनने जा रहे हो, मैं
चाहती हूँ कि तुम जीवन का एक नया रास्ता खोजो, जिससे पूरी मानवता सुखी
हो।’’
- सिद्धार्थ गौतम इससे बहुत प्रभावित हुए। इसके पहले वह कभी नहीं जान पाया
था कि यशोधरा इतनी बहादुर, साहसी और कुलीन स्त्री है। और वह कितना
भाग्यशाली है, जिसे यशोधरा जैसी स्त्री पत्नी के रूप में मिली है और किस
प्रकार आज समय ने दोनों को अलग-अलग कर दिया है। उसने यशोधरा से
राहुल को लाने के लिए कहा। एक पिता की वात्सल्यपूर्ण दृष्टि डालकर वह
वहाँ से विदा हो गया।