35
18. गृह-त्याग
- सिद्धार्थ ने भारद्वाज के हाथों प्रव्रज्या लेने की सोची, जिनका आश्रम कपिलवस्तु
में था। इसलिए वह अगले दिन सवेरे जागा और अपने सारथी छन्न के साथ
अपने प्रिय अश्व कन्थक पर सवार होकर आश्रम की ओर चल पड़ा।
- जैसे ही वह आश्रम के निकट पहुँचा, स्त्री और पुरुष बाहर द्वार पर एकत्रित
हो गये और उससे मिलने के लिए उसे ऐसे घेरा लिया जैसे कोई नई-नवेली
वधू आई हो।
- और जैसे ही वे उसके निकट गए, उनकी आँखें आश्चर्य से खुली रह गइंर्।
उन्होंने बंद कमल की तरह हाथ जोड़कर उसका उचित स्वागत कर नमस्कार
किया।
- तब उसे वे घेरकर खड़े हो गए, उनके चित्त भाव-विह्वल थे, जैसे वे अपनी
स्थिर और प्रेम से खुली आँखों से उसका पान कर रहे हों।
- कुछ स्त्रियों ने तो उन्हें कामदेव का अवतार समझा, क्योंकि वह अपने चमकीले
लक्षणों और अलंकारों से ऐसा सुसज्जित था।
- कुछ दूसरी स्त्रियों ने उसकी शलीनता और ऐष्वर्य को देखकर सोचा कि वह
दिव्य प्रकाशमान चन्द्रमा है, जो पृथ्वी पर उतर आया है।
- कुछ स्त्रियाँ उसकी सुन्दरता से वशीभूत होकर इस प्रकार मुँह फैलाए खड़ी थी,
जैसे उसे निगल जाएँगी। वे एक दूसरे को टकटकी लगाकर देख रही थीं और
धीरे-धीरे आहें भर रही थीं।
- इस प्रकार स्त्रियाँ केवल एक टक उसे निहार रही थीं, न तो वे बोलीं, न
मुस्कराईं। वे उसे घेरे हुए थीं और उसके प्रव्रजित होने के निर्णय पर आश्चर्य
से विचार कर रही थीं।
- बड़ी मुश्किल से वह अपने को भीड़ से अलग कर पाया और उसने आश्रम में
प्रवेश किया।
- सिद्धार्थ नहीं चाहता था कि शुद्धोदन और गौतमी उसकी प्रव्रज्या होते देखें,
क्योंकि वह जानता था कि ऐसे समय में वे इतना दुःख सहन नहीं कर पाएँगे
और टूट जाएँगे। लेकिन उसे जानकारी। दि बिना ही वे आश्रम पहुँच चुके
थे।