36 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर सम्पूर्ण वाघ्मय
- जैसे ही उसने आश्रम के परिसर में प्रवेश किया, उसने अपने माता-पिता को
भीड़ में देखा।
- माता-पिता को देखने पर सबसे पहले वह उनके पास गया और आशीर्वाद मांगा।
वे भावना से इस प्रकार अभिभूत थे कि वे एक शब्द भी बोल न सके और
वे रोते रहे। उन्होंने उसे जोर से पकड़कर छाती से लगा लिया और आसुओं से
नहला दिया।
- छन्न ने कन्थक को आश्रम में एक वृक्ष से बांध दिया और वह पास खड़ा रहा।
शुद्धोदन और प्रजापति को आंसु बहाते देखकर वह भी भावना के वशीभूत हो
गया और रोने लगा।
- बड़ी मुश्किल से अपने को माता-पिता से अलग कर सिद्धार्थ वहां गया जहां
छन्न खड़ा था। उसने अपने वस्त्र और आभूषण घर वापस ले जाने के लिये
उसे दे दिए।
- तब उसने अपना सिर मुडवाया, जो परिव्राजक के लिए आवश्यक था। उसका
चचेरा भाई महानामा परिव्राजक के अनुकूल वस्त्र और भिक्षापात्र ले आया था।
सिद्धार्थ ने उन्हें पहन लिया।
- परिव्राजक के जीवन में प्रवेश करने के लिए तैयार होकर सिद्धार्थ प्रव्रज्या के
लिए भारद्वाज के पास गया।
- अपने शिष्यों की सहायता से भारद्वाज ने आवश्यक संस्कार किए और सिद्धार्थ
गौतम के परिव्राजक होने की घोषणा की।
- यह याद करके कि उसने वाक्य-संघ को दो वचन दिए थे-प्रव्रज्या लेना और
अविलम्ब ही शाक्य साम्राज्य छोड़ना। प्रव्रज्या संस्कार के पूरा हो जाने के तुरंत
बाद, बिना देरी किए वह अपनी यात्रा पर निकल पड़ा।
- आश्रम में असामान्य रूप से बड़ी भारी भीड़ थी, क्योंकि गौतम की प्रव्रज्या के
कारण स्थितियां विलक्षण थीं। सिद्धार्थ जैसे ही आश्रम से बाहर निकला भीड़
भी उसके पीछे-पीछे चल दी।
- उसने कपिलवस्तु छोड़ दिया और अनोमा नदी की ओर बढ़ा। पीछे मुड़ने पर
उसने देखा कि भीड़ अभी भी उसका पीछा कर रही है।
- उन लोगों को संबोधित करते हुए उसने कहा-‘‘भाइयों एवं बहनों! मेरा पीछा
करने से कोई लाभ नहीं है। मैं शाक्यों और कोलियों के बीच विवाद को
सुलझाने में असफल हो गया हूं। लेकिन यदि आप लोग समझौते के पक्ष में