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जनमत बना लें तो आप लोग इसमें सफल हो सकते हैं। इसलिए आप लोग
अच्छी तरह लौट जाएं।’’ उसकी प्रार्थना सुनकर भीड़ ने पीछे लौटना शुरू कर
दिया।
शुद्धोदन और गौतमी भी महल की ओर लौट गए।
सिद्धार्थ द्वारा उतारे गए वस्त्र और आभूषण को देखने में गौतमी असमर्थ थी,
इसलिए उसने उन्हें कमल के तालाब में फिंकवा दिया।
- प्रव्रज्या ग्रहण करने के समय सिद्धार्थ गौतम की आयु मात्र उनत्तीस वर्ष की
थी।
- लोग यह कहकर उसकरी प्रशंसा करते और आंहें भरते थे-‘‘यह उच्च कुल
का शाक्य था, श्रेष्ठ माता-पिता की संतान था, धनी था, तरुण था, सुंदर शरीर
और बुद्धि से युक्त था, सुख-सुविधा में पला था, उसने पृथ्वी पर शांति और
मानवता के कल्याण के लिए अपने संबंधियों से संघर्ष किया।
- यह शाक्य युवक था, जिसने अपने संबंधियों के बहुमत के आगे झुकने से
इंकार कर दिया और स्वेच्छा से वह दण्ड भोगने के लिए तैयार हो गया, जिसमें
अमीरी के बदले गरीबी, सुविधा के बदले भिक्षाटन और घर के बदले बेघर
मिलना था। और जब वह गया, तो अपने साथ न तो सेवा करने वाला ले गया
और न ही अपने साथ कुछ ऐसी चीज ले गया, जिसे वह इस संसार में अपना
कह सके।
- स्वेच्छा से किया गया यह कार्य उसका परम त्याग था। उसकी यह वीरता है
और कार्य साहसिक है। विश्व के इतिहास में इसके समान कोई उपमा नहीं
मिलती है। यह शाक्स-मुनि या शाक्य-सिंह कहलाने का अधिकारी है।
- एक शाक्य कुमारी कृषा गौतमी का कथन कितना सही था। तब सिद्धार्थ गौतम
को निमित्त करके उसने कहा था-‘‘सचमुच धन्य है वह मां, धन्य है वह पिता,
जिसे ऐसा पुत्र मिला। सचमुच धन्य है वह पत्नी, जिसे ऐसा पति मिला।’’
19. राजकुमार और उसका सेवक
- छन्न को भी कंथक के साथ घर लौट जाना चाहिए था। लेकिन उसने लौटने
से इंकार कर दिया। उसने आग्रह किया कि कंथक के साथ वह राजकुमार को
विदा करके कम से कम अनोमा नदी के किनारे तक चलेगा और छन्न का
आग्रह इतना अधिक था कि गौतम को उसकी बात माननी पड़ी।