38 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर सम्पूर्ण वाघ्मय
अन्त में वे अनोमा नदी के किनारे पहुँचे।
उसके बाद छन्न की ओर घूमकर उसने कहा-‘‘अच्छा मित्र! मेरे साथ आने से
मेरा और तुम्हारा स्नेह प्रमाणित हो चुका है। अपने स्वामी के प्रति ऐसा प्यार
देकर तुमने मुझे दिल से जीत लिया है।’’
- ‘‘मेरे प्रति तुम्हारी अच्छी भावनाओं से मैं काफी प्रसन्न हूँ, परन्तु इस समय मैं
तुम्हें कुछ भी देने में असमर्थ हूँ।’’
- ‘‘जिससे उपकार की आशा हो, उसके प्रति कौन अनुरक्त नहीं होगा? लेकिन
बुरे दिनों में साधारणतया अपने सगे-संबंधी पराए हो जाते हैं।’’
- ‘‘परिवार के लिए एक पुत्र का पालन-पोषण होता है, भावी सुख के लिए पुत्र
पिता को मानता है, आशा के लिए संसारी लोग प्रेम दिखाते हैं, बिना आशा के
निःस्वार्थ जैसी कोई चीज नहीं है।’’
- ‘‘केवल तुम्हीं इसके एक अपवाद हो। इस अश्व को लेकर वापस लौट
जाओ।’’
- ‘‘राजा का प्रेम-विश्वास अभी भी बना होगा। किसी तरह उन्हें दुःख सह लेने
में साथ देना होगा।’’
- ‘‘उन्हें कहना, न स्वर्ग की कामना से, न प्यार के अभाव में और न ही क्रोधवश
मैंने उन्हें छोड़ा है।’’
- ‘‘घर छोड़ने पर उन्हें मेरे लिए शोक नहीं करना चाहिए, संयोग चाहे कितना ही
दीर्घकालीन क्यों न हो, उसका अंत समय या वियोग एक-न-एक दिन आएगा
ही।’’
‘‘जब वियोग अनिवार्य है तो अपने सम्बंधियों से वियोग क्यों नहीं होगा?
‘‘किसी व्यक्ति के मरने पर उसकी सम्पत्ति के उत्तराधिकारी निस्संदेह मिल
जाते हैं, लेकिन उसके पुण्य के उत्तराधिकारी को इस संसार में खोजना बहुत
ही कठिन है। शायद होता ही नहीं।’’
- ‘‘उसके मेरे पिता राजा को देखभाल की आवश्यकता है। वे कह सकते हैं कि
मैंने अनुपयुक्त समय पर गृह-त्याग किया है, लेकिन कर्त्तव्य के लिए कोई
गलत समय नहीं होता।’’
- ‘‘मित्र! तुम मेरे पिता-राजा को इन्हीं शब्दों से सम्बोधित करना और कोशिश
करना कि वे मुझे याद न कर सकें।’’