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- ‘‘हाँ, माँ से कहना कि मैं उसके प्यार के लायक सिद्ध नहीं हुआ। वे अच्छे
व्यक्तित्व वाली हैं, मृदुभाषी भी हैं।’’
- इन शब्दों को सुनकर, दुःख से अभिभूत होकर भावनापूर्ण रुँघे कंठ से छन्न ने
हाथ जोड़कर उत्तर दिया।
- ‘‘स्वामी! यह देखकर कि आप अपने संबंधियों को वियोग-दुःख देकर जा रहे
हैं, मेरा दिल ऐसे बैठा जा रहा है, जैसे दलदल में फंसा हुआ हाथी।’’
- ‘‘आपके ऐसे दृढ़ निश्चय से किसके आँसू न टपकेंगे, चाहे उसका दिल लोहे का
ही क्यों न बना हो और यदि यह प्रेम से कम्पित हो तो फिर क्या कहना?’’
- ‘‘कहाँ तो यह कोमल शरीर, जो केवल महल में रहने योग्य है और कहाँ यह
संन्यासी वन की भूमि, जो नुकीली कुश घास से ढँकी है।’’
- ‘‘हे राजकुमार! आपका यह निर्णय जानकर मैं कपिलवस्तु के लोगों को दुःख
देने के लिए इस घोड़े को वापस कैसे ले जा सकता हूँ?’’
- ‘‘निश्चय ही आप अपने वृद्ध पिता को छोड़कर वैसे नहीं जाएँगे, जैसे कोई
विधर्मी सही धर्म को छोड़ कर जाता है।’’
- ‘‘और आप अपनी द्वितीय माता को, जिसने आपको सावधानीपूर्वक पाला-पोसा,
छोड़कर वैसे नहीं जाएँगे, जैसे कोई कृतध्न उपकारी छोड़कर चला जाता
है।’’
- ‘‘आप अपनी पत्नी को छोड़कर कैसे जा सकते हैं, जो सर्वगुणसम्पन्न है, जो
अपने परिवार के लिए यशस्वी है, जो पतिव्रता है और जो एक बच्चे की माँ
है।’’
- ‘‘धर्म और यश को अच्छी तरह जानने वाले! आप इस तरह यशोधरा के बेटे
को कैसे छोड़ सकते हैं जैसे दुराचारी गौरव को छोड़ देता है?’’
- ‘‘अथवा स्वामी अगर आपने अपने संबंधियों और अपने साम्राज्य को छोड़
देने का संकल्प कर ही लिया है, तो मुझे नहीं छोड़ेंगे, क्योंकि आप ही मेरे
शरण-स्थल हैं।’’
- ‘‘आपको अकेला वन में छोड़कर मैं अपना दग्ध-हृदय लेकर शहर में नहीं लौट
सकता।’’
- ‘‘अगर मैं आपके बिना शहर जाऊँगा, तो राजा मुझसे क्या कहेगा और मैं आपकी
पत्नी को शुभ-समाचार सुनाने की जगह क्या कहूँगा?’’