19. राजकुमार और उनका सेवक - Page 68

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  1. ‘‘हाँ, माँ से कहना कि मैं उसके प्यार के लायक सिद्ध नहीं हुआ। वे अच्छे

व्यक्तित्व वाली हैं, मृदुभाषी भी हैं।’’

  1. इन शब्दों को सुनकर, दुःख से अभिभूत होकर भावनापूर्ण रुँघे कंठ से छन्न ने

हाथ जोड़कर उत्तर दिया।

  1. ‘‘स्वामी! यह देखकर कि आप अपने संबंधियों को वियोग-दुःख देकर जा रहे

हैं, मेरा दिल ऐसे बैठा जा रहा है, जैसे दलदल में फंसा हुआ हाथी।’’

  1. ‘‘आपके ऐसे दृढ़ निश्चय से किसके आँसू न टपकेंगे, चाहे उसका दिल लोहे का

ही क्यों न बना हो और यदि यह प्रेम से कम्पित हो तो फिर क्या कहना?’’

  1. ‘‘कहाँ तो यह कोमल शरीर, जो केवल महल में रहने योग्य है और कहाँ यह

संन्यासी वन की भूमि, जो नुकीली कुश घास से ढँकी है।’’

  1. ‘‘हे राजकुमार! आपका यह निर्णय जानकर मैं कपिलवस्तु के लोगों को दुःख

देने के लिए इस घोड़े को वापस कैसे ले जा सकता हूँ?’’

  1. ‘‘निश्चय ही आप अपने वृद्ध पिता को छोड़कर वैसे नहीं जाएँगे, जैसे कोई

विधर्मी सही धर्म को छोड़ कर जाता है।’’

  1. ‘‘और आप अपनी द्वितीय माता को, जिसने आपको सावधानीपूर्वक पाला-पोसा,

छोड़कर वैसे नहीं जाएँगे, जैसे कोई कृतध्न उपकारी छोड़कर चला जाता

है।’’

  1. ‘‘आप अपनी पत्नी को छोड़कर कैसे जा सकते हैं, जो सर्वगुणसम्पन्न है, जो

अपने परिवार के लिए यशस्वी है, जो पतिव्रता है और जो एक बच्चे की माँ

है।’’

  1. ‘‘धर्म और यश को अच्छी तरह जानने वाले! आप इस तरह यशोधरा के बेटे

को कैसे छोड़ सकते हैं जैसे दुराचारी गौरव को छोड़ देता है?’’

  1. ‘‘अथवा स्वामी अगर आपने अपने संबंधियों और अपने साम्राज्य को छोड़

देने का संकल्प कर ही लिया है, तो मुझे नहीं छोड़ेंगे, क्योंकि आप ही मेरे

शरण-स्थल हैं।’’

  1. ‘‘आपको अकेला वन में छोड़कर मैं अपना दग्ध-हृदय लेकर शहर में नहीं लौट

सकता।’’

  1. ‘‘अगर मैं आपके बिना शहर जाऊँगा, तो राजा मुझसे क्या कहेगा और मैं आपकी

पत्नी को शुभ-समाचार सुनाने की जगह क्या कहूँगा?’’