40 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर सम्पूर्ण वाघ्मय
- ‘‘आप कहते हैं कि मैं आपके अवगुण राजा को सुनाऊँ, ताकि उनका स्नेह
कम हो जाए। यदि मैं निर्लज्ज होकर भी सुनाऊँ तो भी मेरी बातों पर किसी
को विश्वास नहीं होगा।’’
- ‘‘जो हमेशा दयावान रहा हो, जो दया करने में कभी असफल नहीं हुआ हो,
उसको यह शोभा नहीं देता कि वह उसे छोड़ दे, जो उसे प्यार करता हो।
इसलिए आप मुझ पर दया कीजिए और लौट चलिए।’’
- छन्न के इन दुःख भरे शब्दों को सुनकर सिद्धार्थ गौतम ने अति विनम्रतापूर्वक
उत्तर दिया -
- ‘‘छन्न! मुझसे उत्पन्न वियोग के दुःख को छोड़ो। भिन्न-भिन्न और नाना जन्म
धारण करने वाले प्राणियों के लिए परस्पर वियोग अनिवार्य है।’’
- ‘‘यदि मैं स्नेहवश अपने सगे-सम्बन्धियों को न भी छोडूँ, तो भी मृत्यु हम
लोगों को एक न एक दिन एक दूसरे को छोड़ने के लिए अनिवार्यतः पृथक
कर देगी।’’
- ‘‘मेरी माँ, जिसने मुझे कितने कष्ट से जन्म दिया, उसके लिए मैं कहाँ हूँ?
और मेरे लिए वह कहाँ है?’’
- ‘‘जैसे पक्षी वृक्ष पर एक साथ बसेरा करते हैं, फिर एक दूसरे से दूर चले जाते
हैं, उसी प्रकार सभी जीवों के मिलन का अंत वियोग में ही होता है।’’
- ‘‘जिस प्रकार बादल एक साथ होकर फिर दूर चले जाते हैं, उसी प्रकार मैं
प्राणियों के मिलन और विछोह को समझता हूँ।’’
- ‘‘एक दूसरे को धोखा देते हुए यह दुनिया चलती रहती है, इसमें मिलन के
समय किसी को अपना समझना सही नहीं है, क्योंकि ऐसा समझना खतरनाक
है।’’
- क्योंकि ऐसा ही है इसलिए मेरे प्रिय मित्र! शोक मत करो। लेकिन वापिस लौट
जाओ और यदि तुम्हारा प्रेम बरकरार रहे, तो जाओ और फिर लौट कर चले
आना’’।
- ‘‘मेरी निन्दा किए बिना ही तुम कपिलवस्तु के लोगों को कहना कि उसके
लिए तुम्हारा प्रेम है, उसे छोड़ दें, क्योंकि यह उसका दृढ़ निश्चय है।’’
- स्वामी और सेवक के बीच वार्तालाप सुनकर श्रेष्ठ कंथक अपनी जीभ से उसके
पैर चाटने लगा और अपनी आँखों से गर्म आँसू बहाने लगा।