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- झिल्ली द्वारा युक्त उँगलियों वाले हाथ, जिस हाथ पर मंगल स्वास्तिक से चिन्हित
था और हथेली अन्दर की ओर मुड़ी थी, हाथ द्वारा गौतम ने उसे थपथपाया
और एक दोस्त की भाँति उसे सम्बोधित करके कहा -
‘‘कंथक! सहन कर। आँसू मत बहा। तेरा परिश्रम जल्दी ही सफल होगा।’’
विदाई का समय आया जानकर छन्न ने गौतम को परिव्राजक रूप को नमन
किया।
तब, कंथक और छन्न से विदाई लेकर गौतम भी अपने मार्ग पर चल पड़ा।
साम्राज्य छोड़कर, तुच्छ पोशाक में अपने स्वामी को जंगल में जाता देख वह
हाथ उठाकर रो-रोकर चिल्लाया, फिर वह जमीन पर गिर पड़ा।
- पीछे देखकर वह जोर-जोर से फिर रोने लगा। उसने अश्व कंथक को अपनी
बाँहों में भर लिया। फिर निस्सहाय होकर बार-बार विलाप करते उसने वापसी
यात्रा शुरू की।
- रास्ते में कभी वह सोचता, कभी विलाप करता, कभी लड़खड़ाता और कभी
गिर जाता। अपने टूटे हुए हृदय के कारण रास्ते में वह बहुत बड़बड़ाता जा रहा
था लेकिन उसे कुछ मालूम नहीं था कि वह क्या कर रहा है।
20. छन्न की वापसी
- जब उसका स्वामी जंगल में चला गया तो छन्न ने सड़क पर चलते हुए अत्यन्त
शोक संतप्त मन का दुःख कम करने का भरसक प्रयास किया।
- उसका हृदय इतना भारी था कि कंथक के साथ वह जिस रास्ते को एक रात
में तय कर लेता था, उस रास्ते को तय करने में उसे आठ दिन लग गए। पूरी
राह वह अपने स्वामी की अनुपस्थिति के बारे में सोचता जा रहा था।
- अश्व कंथक अभी भी थकान से चूर होकर बहादुरी से चल रहा था, लेकिन
उसने अपनी जीवंतता खो दी थी और हालाँकि अभी वह अलंकृत था, लेकिन
अपने स्वामी की अनुपस्थिति में उसने अपना तेज खो दिया था।
- जिस तरफ उसका स्वामी गया था। उस दिशा में घूम-घूमकर शोक संतप्त
आवाज में वह बार-बार हिनहिनाता और भूखे होने के बावजूद उसने पहले की
तरह रास्ते में न तो घास खायी, न पानी पिया।
- धीरे-धीरे अंत में दोनों कपिलवस्तु पहुँच गए, जो गौतम के चले जाने से एकदम
खाली लग रहा था। वे शरीर से शहर पहुँच गए, लेकिन हृदय से नहीं।