48 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर सम्पूर्ण वाघ्मय
- अपने सुन्दर रूप और पूर्ण शांति से परिपूर्ण तथा आश्चर्य व प्रेम-भाव से भरा
हुआ राजा वहाँ गया।
- शालीनतापूर्वक उसके पास जाकर बिम्बिसार ने उससे कुशल-क्षेम पूछा और वैसी
ही शालीनता से गौतम ने भी राजा को अपने कुशल होने की बात कही।
- तब राजा साफ चट्टान पर बैठ गया और अपने मनोभाव व्यक्त करते हुए इस
प्रकार कहा -
- ‘‘तुम्हारे परिवार से मेरी वंशानुगत प्रगाढ़ मैत्री है, इसलिए मेरे पुत्र तुमसे कुछ
कहने की इच्छा उत्पन्न हुई और मेरी बात ध्यान से सुनो।’’
- ‘‘जब मैं आरंभ से तुम्हारे सूर्य-वंश के बारे में सोचता हूँ, तुम्हारे नवीन यौवन
और सौंदर्य के बारे में सोचता हूँ, तो मुझे आश्चर्य होता है कि तुमने राजकुमार
का जीवन छोड़कर सर्वथा बेमेल संन्यासी जीवन व्यतीत करने का दृढ़ निश्चय
कैसे कर लिया?’’
- ‘‘तुम्हारा शरीर लाल-चन्दन से सुगंधित होने के योग्य है, काषाय वस्त्र के लिए
नहीं, तुम्हारे हाथ साम्राज्य की रक्षा करने के योग्य है, भिक्षा के लिए नहीं हैं।’’
- ‘‘इसलिए हे तरुण! यदि तुम अपना पैतृक राज्य नहीं चाहते हो, तो मेरा आधा
राज्य स्वीकार करो।’’
- ‘‘यदि तुम इसे स्वीकार करोगे, तो तुम्हारे अपने लोगों को कोई कष्ट नहीं
होगा। समय बीतने पर शाही सत्ता अंत में शांत चित्तों की ही शरण में आती
है। इसलिए कृपा कर तुम बात मान लो। सत्पुरुषों की सहायता पाकर सत्पुरुषों
की सम्पन्नता बहुत बलवती हो जाती है।’’
- ‘‘यदि अपने कुलाभिमान के कारण तुम्हें मेरी बात मानना उचित नहीं लगता
हो, तो अनगिनत सेनाओं के साथ धनुष-बाण लेकर मेरी सहायता से अपने
विरोधियों को जीतो।’’
- ‘‘इसलिए इन पुरुषार्थों में से किसी एक को चुनो। धार्मिक नियम के अनुसार
धन और सुख की प्राप्ति हेतु आचरण करो। पहले प्रेम की, फिर मोक्ष की उलटे
क्रम से इच्छा करो। ये ही तीन जीवन के उद्देश्य हैं। जब मनुष्य मर जाता है,
तो इस संसार के संदर्भ में सभी कुछ समाप्त हो जाता है।’’
- ‘‘इसलिए जीवन के तीनों पुरुषार्थों से अपने व्यक्तित्व का विकास करो। जब
धर्म, अर्थ और काम की प्राप्ति सही अर्थों में पूर्ण होगी, तभी मनुष्य का अंत
पूर्ण माना जाएगा।’’