2. राजा बिम्बिसार और उनका परामर्श - Page 78

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  1. ‘‘धनुष-बाण धारण करने वाली इन बाहों को बेकार न होने दो। इनमें इस पृथ्वी

का तो कहना ही क्या, बल्कि तीनों लोक को जीत लेने की सामर्थ्य है।’’

  1. ‘‘स्नेहवश मैं तुमसे कहता हूँ-राज्य करने या संन्यासी वस्त्र में देखकर उत्पन्न

हुई अहंकार-भावना के कारण नहीं। मैं दया की भावना से भर गया हूँ और

मेरी आँखों में आँसू हैं।’’

  1. ‘‘अपने कुल के उत्तम पुरुष और संन्यासी बनने के इच्छुक! अभी समय है

सुख भोगों का आनन्द लो, फिर बुढ़ापा आ जाएगा और तुम्हारे सारे सौन्दर्य को

नष्ट कर देगा।’’

  1. ‘‘वृद्धावस्था में आदमी धर्म से पुण्य कमा सकता है। वृद्धावस्था सुख-भोग के

योग्य नहीं होती है, इसलिए कहा भी गया है कि सुख-भोग नवयुवकों के लिए,

संपत्ति अर्जन मध्य-वयस्कों के लिए और धर्म वृद्धों के लिए है।’’

  1. ‘‘इस संसार में नवयुवक का धन और धर्म से विरोध है। चूंकि काम-सुखों को

सुरक्षित रखना मुश्किल होता है, इसलिए जहाँ भी काम-सुख का अवसर मिले

नवयुवक को उसका उपभोग कर लेना चाहिए।’’

  1. ‘‘वृद्धावस्था का झुकाव चिन्तन-मनन की ओर होता है। यह गंभीर और शांत

रहने की ओर प्रवृत्त होता है। थोड़े प्रयास से ही यह संयत हो जाता है।’’

  1. ‘‘इसलिए भ्रामक, अस्थिर, वस्तुओं की ओर अनुरक्त, असावधान, अधैर्यवान

और अदूरदर्शी नवयुवक की अवस्था पार कर जाने के बाद आदमी को लगता

है कि मानो वह भयानक जंगल से बचकर निकल आया है।’’

  1. ‘‘इसलिए, लापरवाह, चंचल और अस्थिर युवावस्था को गुजर जाने दो। हमारा

आरंभिक जीवन इन सुख भोगों के लिए ही है। इस समय इन्द्रियों को वश में

नहीं रखा जा सकता है।’’

  1. ‘‘यदि, सचमुच धर्म में ही तुम्हारी रुचि है तो यज्ञ करो। सर्वोत्तम स्वर्ग पाने के

लिए यज्ञ करना तुम्हारे परिवार की प्राचीन प्रथा है।’’

  1. ‘‘अपनी बांहों में स्वर्ण-निर्मित बाजू-बंद पहने और अनेक प्रकार के आभूषणों

से अलंकृत राजर्षि यज्ञ द्वारा भी वही लक्ष्य प्राप्त कर सकते हैं, जिसे अनेक

महान् ऋषियों ने आत्म तपस्या द्वारा प्राप्त किया है।’’