50 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर सम्पूर्ण वाघ्मय
3. बिम्बिसार को गौतम का उत्तर
- इस प्रकार मगध-नरेश ने इन्द्र की भांति सभ्य और ओजस्वी ढंग से अपनी बात
रखी। लेकिन इसे सुनकर राजकुमार विचलित नहीं हुआ। वह पर्वत की भांति
अटल था।
- मगध-नरेश द्वारा सम्बोधित करने के पश्चात् गौतम ने आत्म-संयमित, स्थिर और
मित्रवत, लेकिन मैत्रीपूर्ण आवाज में उत्तर दिया-
- ‘‘आपने जो कुछ कहा वह आपके योग्य है। हे राजन! आप एक महान कुल
में पैदा हुए हैं, जिसका राज-चिह्न सिंह है, आप अपने मित्रों के हित-चिन्तक
हैं और मेरी ओर आपका मित्रवत व्यवहार आपके लिए स्वाभाविक ही है।’’
- ‘‘दुष्ट मानसिकता वाले लोगों की पारिवारिक मित्रता शीघ्र नष्ट हो जाती है, जो
सुशील लोग हैं, जो नए-नए मैत्रीपूर्ण व्यावहारिक कार्यों से अपने पूर्वजों की
पुरानी मित्रता को बढ़ाते हैं।’’
- ‘‘जो व्यक्ति प्रतिकूल परिस्थितियों में नहीं बदलते, उन्हें मैं दिल से अच्छा मित्र
मानता हूँ। सुख के दिनों में धनी व्यक्ति का मित्र कौन नहीं होता?’’
- ‘‘इसलिए जिस व्यक्ति ने संसार में धन-सम्पदा अर्जित की है और उसने
उसका उपयोग अपने मित्रों और धर्म के लिए किया है, तो उसी में उस धन
की सार्थकता है।’’
- ‘‘हे राजन्! मेरे बारे में आपका परामर्श आपके सौंदर्य और मित्रता के कारण है।
मित्रवत् शालीनता के साथ ही मैं भी आपका समाधान करने हेतु उत्तर दूँगा।’’
- ‘‘मुझे साँपों से, आकाश से गिरने वाले अस्त्र से, और हवा के झोंको द्वारा
लहलहाती आग शोलों से उतना भय नहीं लगता, जितना भय मुझे इन इन्द्रियों
की सांसारिक विषय-वस्तुओं से लगता है।’’
- ‘‘ये नश्वर सुख हमारे धन और प्रसन्नता के लुटेरे हैं, जो खाली और भ्रम सदृश्य
संसार में तैरते रहते हैं। इन सुखों की आशा ही व्यक्ति की चिन्ता को भ्रमित
कर देती है और दिल में जगह बना लेने पर ये और हानिकारक होते हैं।’’
- ‘‘इन सांसारिक विषय-वस्तुओं में लिप्त लोगों की तो क्या, देवताओं को भी
स्वर्ग में प्रसन्नता नहीं मिलती, तो मर्त्य-लोक का क्या कहना है? जो प्यासा है,
वह भौतिक सुखों से ठीक उसी प्रकार कभी भी तृप्त नहीं होता, जिस प्रकार
हवा की मित्र आग जलावन से कभी संतुष्ट नहीं होती।’’