52 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर सम्पूर्ण वाघ्मय
विपत्ति लाते हैं, एक आत्मसंयमी बुद्धिमान् व्यक्ति उनमें संतुष्टि कैसे पा सकता
है?’’
- ‘‘ये भोग-विलास इंद्रियों की तरह नाशवान हैं। जो भी इनमें लिप्त होता है,
उसके लिए ये विपत्ति ही लाते हैं। कौन आत्मसंयमी बुद्धिमान व्यक्ति इनमें
संतुष्टि पाएगा?’’
- ‘‘जो आत्मसंयमी व्यक्ति काम-विषयों की गोद में पड़कर डंसे जाते हैं और वे
परमानन्द न पाकर विनाश को प्राप्त करते हैं, वे इन क्रुद्ध निर्दयी, सर्प सदृश्य
भोग-विलास में संतुष्टि कैसे पा सकते हैं?’’
- ‘‘जिस प्रकार भूखा कुत्ता हड्डी को चाटने से संतुष्ट नहीं होता, उसी प्रकार
भोग-विलास में लिप्त व्यक्ति भी संतुष्ट नहीं होता। जो सूखी हड्डियों के कंकाल
की तरह है, उनमें एक आत्मसंयमी बुद्धिमान व्यक्ति संतोष कैसे पाएगा?’’
- ‘‘जिसकी बुद्धि भोग-विलास की ओर है, जो इन सुखों की आशा का दयनीय
दास है, वह इसी संसार में मृत्यु-दुःख का अधिकारी है।’’
- ‘‘संगीत के कारण हिरण विनाश को प्राप्त होते हैं, दीपक की चमक के कारण
पतंगे आग में जल-भुन कर जान गंवाते हैं, लोभी मछली मांस के लिए लोहे
का कांटा निकल जाती है इसलिए सांसारिक सुख उनके भयावह विनाश का
ही कारण बनते हैं।’’
- ‘‘यह जो साधारणतया धारणा है कि भोग-विलास भोगने के लिए हैं, लेकिन
अच्छी तरह परीक्षण करने पर उनमें कोई भी योग्य पदार्थ कुछ नहीं है। अच्छी
पोशाक और इन्हीं की तरह अन्य वस्तुएं भी केवल सहायक हैं। ये अधिक से
अधिक दर्द के उपचार कैसे समझे जा सकते हैं।’’
- ‘‘पानी प्यास बुझाने के लिए, भोजन भूख मिटाने के लिए, घर हवा, वर्षा
और धूप से बचाने के लिए, कपड़ा सर्दी और नग्नता से बचाने के लिए होता
है।’’
- ‘‘इसी प्रकार शय्या नींद पूरी करने के लिए, वाहन यात्रा की थकान मिटाने
के लिए, आसन खड़े रहने की थकावट मिटाने के लिए होता है। इसी प्रकार
स्नान, सफाई, स्वास्थ्य और स्फूर्ति का साधन हैं।’’
- ‘‘जितनी भी बाह्य-वस्तुएं हैं, वे मनुष्यों के लिए मात्र दुःख-उपचार के साधन
हैं, उनमें सुख का कोई स्रोत नहीं है। बुद्धिमान आदमी केवल उपचार के लिए
प्रयोग में आने वाले इन साधनों को योग्य वस्तुएँ मान कर कैसे भोगेगा?’’