3. बिम्बिसार को गौतम का उत्तर - Page 82

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  1. जो आदमी सन्निपात के ज्वर से तप रहा हो, उपचार के लिए ठण्डी पट्टी

आदि को योग्य वस्तुएं माने, जबकि वे केवल दर्द को कम करने के लिए हैं,

तो वही व्यक्ति भोग-विलास को सुख का नाम दे सकता है।’’

  1. ‘‘क्योंकि सभी प्रकार के भोग-विलास अनित्य हैं, इसलिए मैं उन्हें भोग-विलास

का नाम नहीं दे सकता यथार्थ में जो भोग-विलास की स्थितियां सुख-दायक

प्रतीत होती हैं, वहीं दुःखकारक भी बन जाती हैं।’’

  1. ‘‘गर्म ऊनी पोशाक और सुगंधित धूप सर्दी में प्रिय लगते हैं, लेकिन गर्मी के

दिनों में वे ही अच्छे नहीं लगते और चन्द्रमा की चान्दजी और चन्दन की लकड़ी

गर्मी में सुखकारक होते हैं, जबकि वही सर्दी में अप्रिय बन जाते हैं’’

  1. ‘‘संसार में दो विरोधी वस्तुएं ठीक नहीं लगतीं, जैसे लाभ-हानि यश-अपयश,

सुख-दुख आदि और इसी तरह की अन्य, इस संसार में एक दूसरे से द्वन्द्वों के

रूप से जुड़े हुए हैं, इसलिए पृथ्वी का कोई मनुष्य सदा के लिए न तो सुखी

रहता है, न दुःखी रहता है।’’

  1. ‘‘जब मैं सुख और दुःख के स्वभाव के मिश्रण को देखता हूँ, तो मैं राजसत्ता

और दासता को एक समान ही समझता हूँ। एक राजा न तो हमेशा हँसता रहता

है और न ही एक दास हमेशा रोता रहता है।’’

  1. ‘‘चूँकि राजा के उत्तरदायित्व अधिक होते हैं, इसलिए राजा की चिन्ताएँ भी

अधिक होती हैं। राजा तो कपड़े टांगने की खूंटी के समान होता है, उसे संसार

के दुःख झेलने पड़ते हैं।’’

  1. ‘‘वह राजा अभागा ही है, यदि वह उस राजसत्ता में विश्वास करता है, जो

नष्ट होने वाली है और दूसरी ओर यदि वह उसमें विश्वास नहीं करता, तो ऐसे

कायर राजा को सुख ही क्या हो सकता है?’’

  1. ‘‘और संपूर्ण पृथ्वी को जीतने के बाद भी राजा का निवास एक ही शहर में

रह सकता है और उसमें भी केवल एक ही महल में सो सकता है। राज्य का

बाहरी भाग क्या दूसरों के लिए ही नहीं है?’’

  1. ‘‘और राजा को भी एक जोड़ा पोशाक, भूख मिटाने भर खाना, एक शय्या और

आसन से अधिक राजा को कुछ नहीं चाहिए और सारी चीजें उसके घमण्ड

के लिए हैं।’’

  1. ‘‘और अगर इन सारी वस्तुओं का उपयोग संतोष के लिए ही है, तो मैं साम्राज्य

के बिना भी संतुष्ट हो सकता हूँ। यदि संसार में कोई इनके बिना संतुष्ट है, तो

क्या ये सारी वस्तुएँ अनावश्यक नहीं हैं?’’