4. गौतम का उत्तर (समाप्त) - Page 83

54 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर सम्पूर्ण वाघ्मय

  1. ‘‘जो पथिक मंगलकारी मार्ग पर आरूढ़ हो गया है, वह भोग-विलास हेतु धोखा

खाने के लिए नहीं है। आपके द्वारा कही गई मित्रता की याद करके मैं आपसे

बार-बार पूछता हूँ कि क्या इन भोग-विलासों में कुछ सार है?’’

  1. ‘‘क्रोध के कारण मैंने गृह-त्याग नहीं किया, न ही किसी शत्रु के वाण ने मेरे

मुकुट को गिराया है, न ही भव्य वस्तुओं के लिए इच्छाएं की हैं, जिसके कारण

मैं आपका इस प्रकार प्रस्ताव अस्वीकार कर रहा हूँ।’’

  1. ‘‘जो एक बार क्रुद्ध सर्प से बच जाए या चलते हुए उल्का-पिण्ड की आग से

बच जाए, तो वह उसे फिर पाने की इच्छा नहीं रखता, उसी प्रकार भोग-विलास

को छोड़ देने के बाद व्यक्ति फिर उसे पाने की इच्छा नहीं रखेगा।’’

  1. ‘‘जो आँख वाला है वह अंधे से ईर्श्या करे, जो मुक्त है वह बंधे हुए से ईर्ष्या

करे, जो धनवान है वह गरीब से ईर्ष्या करे, जो स्वस्थ चित्त होकर वह पागल

से ईर्ष्या, तो मैं कहता हूँ केवल वही व्यक्ति किसी विषयासक्त से ईर्ष्या कर

सकता है।’’

  1. ‘‘मेरे कल्याण मित्र! जो भिक्षाटन पर जीवन-यापन करता है, वह दया का पात्र

नहीं है। उसे यहाँ परम सुख, पूर्ण शांन्ति प्राप्त है और यहाँ के बाद उसके सारे

दुःखों का अन्त हो गया है।’’

  1. ‘‘अपनी अथाह संपत्ति के बीच रहते हुए भी, जो तृष्णा से वशीभूत हैं, वही

दया के पात्र हैं। उसने न तो यहां शांति व सुख पाया है और यहां के बाद भी

वह दुःख का अनुभव तो करेगा ही।’’

  1. ‘‘जो कुछ आपने कहा वह आपके शील, आपकी जीवन-पद्धति और आपके

कुल के अनुरूप है और अपनी दृढ़ प्रतिज्ञा का पालन करना मेरे चरित्र, मेरी

जीवन-पद्धति और मेरे कुल के अनुरूप है।’’

4. गौतम का उत्तर (समाप्त)

  1. ‘‘मैं संसार की कलह से आहत हूँ। मैं शांति की खोज के लिए बाहर आया

हूँ। मैं इस दुःख का अन्त करने के बदले में इस पृथ्वी का राज्य तो क्या दिव्य

लोक के साम्राज्य को भी स्वीकार नहीं करूँगा।’’

  1. ‘‘हे राजन्! जैसा कि आपने मुझसे कहा, तीन चीजों का अनुसरण करना ही

मनुष्य का परम ध्येय है और आपने कहा कि मैं विपत्ति के रास्ते पर हूँ, तो

आपकी वे तीनों वस्तुएं अनित्य और असंतुष्ट करने वाली हैं।’’