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- ‘‘और आपका यह कहना कि ‘वृद्धावस्था तक प्रतीक्षा करो, क्योंकि युवावस्था
हमेशा परिवर्तित होती है, यह निर्णय भी अपने आप में अनिश्चित है, क्योंकि
वृद्धावस्था में दृढ़ता नहीं हो सकती और युवावस्था में ही दृढ़ता हो सकती है।’’ 4. ‘‘और चूंकि कर्मों का विपाक इस संसार में सब कुछ अच्छी तरह से निश्चित
कर देता है, तो एक बुद्धिमान व्यक्ति, जो शांति खोजना चाहता है, वह कैसे
वृद्धावस्था तक प्रतीक्षा करेगा, जबकि यह नहीं जानता कि मृत्यु कब आ
जाएगी?’’
- ‘‘जब मृत्यु एक शिकारी जैसी हो, वृद्धावस्था जिसके शस्त्र हों, बाणों के समान
रोग फैले हों, जंगल में हिरनों को मारने के समान प्राणियों को मारता हो, तो
कोई दीर्घायु होने की क्या कामना कर सकता है?’’
- ‘‘चाहे बच्चा हो, युवा हो या वृद्ध हो सबके लिए अनुकूल है कि वे लोग
करुणामय धार्मिक मार्ग पर ही चलें।’’
- ‘‘और जैसा कि आपका कहना है कि धर्म के लिए यज्ञ करने में अप्रमादी बनूँ,
क्योंकि यह मेरे कुल के अनुकूल है और ये महान् फलदायी हैं, तो मैं ऐसे यज्ञों
के फल नहीं चाहता, जो दूसरों को पीड़ा पहुंचा कर प्राप्त किये जाते हैं।’’ 8. भावी फलों की इच्छा से निरीह प्राणियों का वध करना कारुणिक और दयालु
व्यक्ति के योग्य नहीं है, चाहे यज्ञ के फल चिर-स्थायी ही क्यों न हों।’’ 9. ‘‘और यदि आत्मसंयम, सदाचार और काम-वासना से विरक्ति द्वारा भी सच्चे
धर्म का अनुकरण न किया जाए, तो भी याज्ञिक होना ठीक नहीं क्योंकि
यज्ञ-धर्म के अनुसार पशुओं की बलि के बिना यज्ञ का उच्चतम फल नहीं
मिल सकता।’’
- ‘‘दूसरे को पीड़ा पहुँचा कर व्यक्ति को प्राप्त सुख इसी संसार में बुद्धिमान
करुणाप्रिय हृदय द्वारा निन्दनीय है, तो फिर किसी अदृश्य लोक के बारे में सुख
मिलने के बारे में कहना ही क्या?’’
- ‘‘हे राजन! भावी फल की इच्छा से मैं किसी कर्म में प्रेरित नहीं हो सकता,
क्योंकि मेरे मन में भावी जन्मों के प्रति कर्म-फल उसी प्रकार अनिश्चित और
दिशाहीन है, जिस प्रकार बादलों से गिरी वर्षा से पीडि़त पौधे।’’ 12. हाथ जोड़कर राजा ने उत्तर दिया ‘‘तुम्हारा उद्देश्य बिना किसी बाधा के पूर्ण हो। जब
भी कभी तुम्हारे जीवन का उद्देश्य पूरा हो जाए, तो इधर पधारने की कृपा करना।’’ 13. गौतम ने फिर अपने यहाँ आने का वचन लेकर राजा अपने दरबारियों सहित
राजमहल लौट आया।